Sunday, 27 January 2019

 अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्जा गालिब जैसे चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता भारत भूषण का सितारा भी कभी इतनी गर्दिश में पड़ गया था कि उन्हें अपना गुजारा चलाने के वास्ते दोयम दर्जे की फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं करने को मजबूर होना पड़ा था।
अलीगढ़ में 1920 में जन्मे भारत भूषण गायक बनने का ख्वाब लिए बम्बई की फ़िल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फ़िल्म चित्रलेखा में छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी। 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी खास पहचान नहीं बन पाई। इस दौरान उन्होंने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आंखें (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और मां (1952) फ़िल्मों में काम किया। भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फ़िल्म बैजू बावरा से चमका।
बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने न सिर्फ विजय भट्ट के प्रकाश स्टूडियो को ही डूबने से बचाया, बल्कि भारत भूषण और फ़िल्म की नायिका मीना कुमारी को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फ़िल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ओ दुनिया के रखवाले.., मन तड़पत हरि दर्शन को आज.., तू गंगा की मौज में जमुना का धारा.., बचपन की मुहब्बत को.., इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम.., झूले में पवन के आई बहार.. और दूर कोई गाए.. धुन ये सुनाए जैसे फ़िल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। इस फ़िल्म से जुडे़ कई रोचक पहलू हैं। निर्माता विजय भट्ट फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और नर्गिस के नाम पर विचार कर रहे थे, लेकिन संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपेक्षाकृत नए अभिनेता-अभिनेत्री को फ़िल्म में लेने पर जोर दिया। इसी फ़िल्म के लिए नौशाद ने तानसेन और बैजू के बीच प्रतियोगिता का गाना शास्त्रीय गायन के धुरंधर उस्ताद आमिर खान और पंडि़त डी.वी. पलुस्कर से गवाया। फ़िल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत मन तपड़त हरिदर्शन को आज..जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था। बैजू बावरा की सफलता से उत्साहित यही टीम एक बार फिर श्री चैतन्य महाप्रभु फ़िल्म के लिए जुड़ी और इसमें सशक्त अभिनय के लिए भारत भूषण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, भक्तों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने सहज स्वाभाविक अभिनय के रंगों से परदे पर जीवंत करने का भारत भूषण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। ठनमें प्रमुख हैं भक्त कबीर (1942), श्री चैतन्य महाप्रभु (1954), मिर्जा गालिब (1954), रानी रूपमती (1957), सोहनी महीवाल (1958), सम्राट्चंद्रगुप्त (1958), कवि कालिदास (1959), संगीत सम्राट तानसेन (1962), नवाब सिराजुद्दौला (1967) आदि।
भारत भूषण के फ़िल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फ़िल्म मिर्जा गालिब का अहम स्थान है। इस फ़िल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्जा गालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि गालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस फ़िल्म के लिए गजलों के बादशाह तलत महमूद की मखमली और गायिका, अभिनेत्री सुरैया की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत बेहद मकबूल हुए .., आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक.., फिर मुझे दीदए तर याद आया।., दिले नादां तुझे हुआ क्या है।., मेरे बांके बलम कोतवाल.., कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां कुछ और भारत भूषण ने लगभग 143 फ़िल्मों में अपने अभिनय की विविधरंगी छटा बिखेरी और अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर तथा देवानंद जैसे कलाकारों की मौजूदगी में अपना एक अलग मुकाम बनाया। बाद में उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा, लेकिन उनकी कोई भी फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं रही। उन्होंने 1964 में अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म दूज का चांद का निर्माण किया, लेकिन इस फ़िल्म के भी बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिट जाने के बाद उन्होंने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली। 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म तकदीर नायक के रूप में भारत भूषण की अंतिम फ़िल्म थी। इसके बाद वह माहौल और फ़िल्मों के विषय की दिशा बदल जाने पर चरित्र अभिनेता के रूप में काम करने लगे, लेकिन नौबत यहां तक आ गई कि जो निर्माता-निर्देशक पहले उनको लेकर फ़िल्म बनाने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। इस स्थिति में उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए फ़िल्मों में छोटी-छोटी मामूली भूमिकाएं करनी शुरू कर दीं। बाद में हालात ऐसे हो गए कि भारत भूषण को फ़िल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। तब मजबूरी में उन्होंने छोटे परदे की तरफ रुख किया और दिशा तथा बेचारे गुप्ताजी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णिम युग के इस अभिनेता ने आखिरकार 27 जनवरी 1992 को 72 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अलीगढ़ शहर के लोगों ने भारत भूषण के योगदान को याद करते हुए नवंबर 2011 में स्व. भारत भूषण मार्ग के नाम पर रोड का नामकरण किया।

Thursday, 24 January 2019

     

Abhimaan (1973) : अमिताभ- जया श्रेष्ठ हैं या कला और प्रतिभा?



फिल्म के विषय में वापिस आयें तो फिल्म में वास्तव में जान पड़ती है डेविड के मैदान में उतरने के बाद और उससे भी ज्यादा तब जब वे उमा को सुबीर के साथ गाते हुये सुनते हैं और अपने साथी से कहते हैं कि अच्छा हो यदि सुबीर उमा को अपने साथ व्यवसायिक रुप से गाने के लिये विवश न करे।
amitabh jayaसाथी के पूछने पर कि इसमें खराबी क्या है।
वे कहते हैं,” देखते नहीं, उमा सुबीर से ज्यादा प्रतिभाशाली है और पुरुषों को बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है कि वे श्रेष्ठ हैं”
साथी लापरवाही से कहता है,” अरे साहब सारी प्रतिभा रसोईघर में और बच्चों को पालने में निकल जायेगी”।
डेविड कहते हैं,” यह तो और भी बुरा होगा”।
डेविड की चिंता जायज है, और आज भी प्रासंगिक है।
स्त्री की प्रतिभा का क्या हो मौटे तौर पर पुरुष द्वारा संचालित इस संसार में?
क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिये अपनी प्रतिभा का गला घोट दे कि उसके खुलकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने से उसके पति का समाज में स्थान उसकी शोहरत और प्रतिभा के सामने कम हो जायेगा?
जनक की सभा में हुये गार्गी याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ की विरासत सनातन काल से चली रही है और भले ही यह घटना भारत में घटी हो पर सत्य यह विश्व की सभी सभ्यताओं के संदर्भ में है।
अभिमान से कुछ ही साल पहले विजय आनंद ने दिखाया था कि कैसे राजू गाइड ने अभिमान के साथ गुस्से में हिकारत भरी दृष्टि से रोज़ी को देखते हुये कहा था कि तुम आज जो इतनी शोहरत और दौलत बटोर रही हो, यह और सारी तुम्हारी सफलता सब मेरी सूझबूझ और मेहनत का नतीजा है वरना तुम क्या थीं – अपने पति के व्यवहार से कुंठित होकर आत्महत्या का प्रयास करने वाली एक कमजोर औरत।

Wednesday, 23 January 2019

प्रधानमंत्री नेहरू और कल्पना मोहन


पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू की सबसे पसंदीदा हीरोइन्स में से एक थी कल्पना मोहन



     फिल्म प्रोफेसर से अभिनेता शम्मी कपूर के अपोजित नजर आई अभिनेत्री कल्पना मोहन से हम ज्यादा वाकिफ नहीं हैं. पर अपने छोटे से फिल्मी करियर में कल्पना ने अपने अभिनय क्षमता का जबरदस्त परिचय दिया था. हालाकि कल्पना ने अपने पूरे फिल्मी करियर में करीब एक दर्जन फिल्में ही की थी. पर इन फिल्मों की कामयाबी का श्रेय कल्पना को कभी नहीं मिला. शायद इसीलिए कल्पना ने शादीकर जल्द ही अपना घर बसा लिया था. कल्पना 2007 में तब चर्चा में आई थी जब उनकी प्रॉपर्टी को लेकर फर्जीवाड़ा हुआ था. तब तक कल्पना कैंसर की चपेट में आ चुकी थी. और जिंदगी के आखिरी सालों में कल्पना लकवे और चेस्ट इंफेक्शन से भी जूझ रही थी. 4 जनवरी 2012 को कल्पना ने हमेशा के लिए इस दूनिया को अलविदा कह दिया. पर क्या आप जानते हैं कि कल्पना किसी भी फिल्मी बैकग्राउंड से ना होते हुए भी कैसे हिंदी सिनेमा एंट्री ली थी.
दरअसल कल्पना का असली नाम था अर्चना मोहन था. और वो एक बेहतरीन कथक डांसर थी. अब चूकि कल्पना का संबध कांग्रेस पार्टी से भी था. इसलिए वो राष्ट्रपति भवन में होने वाले सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा भी हुआ करती थी. और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कल्पना के सबसे बडे फैन थे. जो कल्पना के कथक डांस के मुरीद हो चुके थे. ऐसे ही एक कार्यक्रम में कल्पना को डांस करते हुए अभिनेता बलराज साहनी और उस समय की मशहूर लेखिका इस्मत चुगतई ने देखा. तो फिल्मों में काम करने सलाह दे दी. कल्पना को भी ये सलाह अच्छी लगी. और फिर वो मुंबई आ गई. फिर यहीं उन्हे शाहिद लतीफ की फिल्म पिकनिक और फिर नॉटी ब्वॉय मिली. लेकिन कल्पना मोहन को शोहरत मिली फिल्म प्रोफेसर की कामयाबी से.

जब 'ट्रेजडी क्वीन' मीना कुमारी ने संगीतकार नौशाद अली के लिए लिखी थी शायरी


भारतीय सिनेमा में पाकीज़ा का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जा चूका है. इस फिल्म ने मीना कुमारी को एक अलग ही पहचान दिलाई. मीना कुमारी एक अदाकारा के साथ साथ गजब की शायर भी थी. उन्होंने नौशाद अली के लिए शायरी लिखते हुए कहा की '' नौशाद साहब जब रात आती है तो मुझे सुबह का इंतजार रहता है और जब दिन आता है तो रात आने का ख़ौफ़".

उन्होंने अक्सर अपने जीवन के दर्द और तकलीफों को ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों के ज़रिये बयान किया. चांद तन्हा है आसमां तन्हा, दिल मिला है कहां-कहां तन्हा, टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, शीशे का बदन, उनकी लिखी नज़्में हैं.

एक किताब 'नौशाद, जर्रा जो आफ़ताब बना' में लेखक चौधरी ज़िया इमाम ने मीना कुमारी के जज़्बातों से संबंधित किस्सों का जिक्र किया है. दरहसल, एक दिन फिल्म पाकीज़ा की शूटिंग ख़तम होने के बाद मीना कुमारी नौशाद अली के घर गयीं और उनके काम की सराहना की. उन दिनों उनकी तबियत खराब थी उन्होंने नौशाद से कहा कि "नौशाद साहब जब रात आती है तो मुझे सुबह का इंतजार रहता है और जब दिन आता है तो रात आने का ख़ौफ़''.

इस पर नौशाद साहब ने मीना कुमारी को एक शेर लिखकर दिया था-
"देख सूरज उफ़क़ में डूब गया, धूप एक सिर से तेरे और ढली
एक दिन उलझनों का और गया, एक कड़ी जिंदगी की और कटी".

Monday, 21 January 2019

Katha (1983) : सीधा-सच्चा, आदर्शवादी और अंतर्मुखी पुरुष बनाम जालसाज, झांसेबाज छलिया !

Kathaफिल्म ‘कथा’ केवल खरगोश और कछुए की कहानी का मानवीय दृश्यात्मक रूपांतरण नहीं है| ‘कथा’ के मूल में एक कहावत है – हर चमकती चीज सोना नहीं होती| जो अच्छा दिखाई दे रहा हो, जरूरी नहीं वह वास्तव में अच्छा हो भी| और यह बात फिल्म को सार्वभौमिकता प्रदान करती है| किसी भी देश में किसी भी भाषा में यह परिकल्पना काम कर जायेगी|
मनुष्य की इच्छाएं और सपने, जो कि अभी पूरे होने बाकी हैं, उसे उस वक्त अक्ल का अंधा बना देते हैं जब ऐसी कोई चीज सामने आ जाए जिसे वह अरसे से चाह रहा हो| लंबे समय से इच्छित वस्तु की अकस्मात उपलब्धि समझने की शक्ति क्षीण कर देती है| कहते हैं कि स्त्री, चाहे वह संसार की किसी भी जगह की क्यों न हो, के मन में एक ऐसे पुरुष से विवाह करने की इच्छा रहती है, जो सर्वगुण सम्पन हो, दिखने में आकर्षक हो, और धनी हो, और ऐसा गुण भी रखता हो कि न केवल अपनी भावनाओं को आराम से व्यक्त कर सके बल्कि उसके भावों और उसकी भावनाओं को भी बिना उसके द्वारा व्यक्त किये ही समझ ले| अक्सर ऐसे पुरुष जो अंतर्मुखी, शर्मीले, और सीधे, सादे दिल वाले हों और जो हमेशा दूसरों को प्रभावित करने में नहीं लगे रहते, स्त्रियों दवारा भोंदू की संज्ञा पाते हैं| गरीब और विकासशील देश में निम्न-मध्यवर्गीय लोगों में बहुतायत ऐसे लोगों की होती है जहां माता-पिता अपनी संतानों को सभी सुख सुविधाएँ मुहैया नहीं करा पाते और बचपन से ही बच्चों के मन में जो नहीं मिल पा रहा है, उसका एक अलग कमरा बनता चला जाता है जहां मौक़ा मिलते ही इन सब सुख सुविधाओं का उपभोग कर लेने की इच्छाएं एकत्रित होती चली जाती हैं| भारत जैसे देश में जहां लड़की शादी के बाद पति के घर चली जाती है, लड़कियों के मन में ऐसा भाव होना स्वाभाविक है कि जो माता-पिता के घर में न मिला वह सब पति के घर उसे मिल जाना चाहिए| माता-पिता भी अपनी लड़की की शादी ऐसे वर से तो करना ही चाहते हैं जो धन-संपत्ति और हैसियत में उनसे बढ़कर हो| लड़का अपने से कम संपत्ति और शैक्षिक और अन्य योग्यताओं वाली लड़की से विवाह कर सकता है, करते हैं पर लड़कियों के लिए ऐसा करना उनके सपनों पर कुठाराघात करने के बराबर होता है| मध्य-वर्ग में ऐसा कम देखने को मिलता है कि लड़की ने अपने से कम आर्थिक हैसियत वाले लड़के से विवाह किया हो| सच्ची योग्यताएं और सच्चे गुण ऐसे में पीछे चले जाते हैं और खोखली मान्यताएं सतह पर आकर जीवन को संचालित करने लगती हैं|
कथा’ ऐसी ही पृष्ठभूमि पर बनी एक बेहतरीन फिल्म है| फिल्म की नायिका भी खालिस सोने को नजरंदाज करके पीतल को सोना समझ गले लगाती है और जीवन का सबसे बड़ा धोखा खाती है|
साधारण कहानी का सादा फिल्मांकन फिल्म की खासियत बन जाता है| फिल्म सीधे-सादे तरीके से कहानी को आगे बढाती हुयी इंसानी मनोविज्ञान को भली भांति परदे पर प्रस्तुत करती है, और दर्शक को उसका विश्लेषण करने का अवसर देती है|
कहानी के स्तर पर देखें तो यह एक साधारण सी कहानी है| राजाराम पु. जोशी अर्थात राजाराम पुरषोत्तम जोशी (नसीरुद्दीन शाह) बम्बई में एक चाल में अकेला रहता है और जूते की एक कम्पनी में क्लर्क का काम करता है| राजाराम बेहद सीधा सादा, ईमानदार और बला का परिश्रमी व्यक्ति है| वह पड़ोस के घर में रहने वाली संध्या (दीप्ति नवल) से प्रेम तो करता है पर उससे अपने प्रेम का इजहार करने की हिम्मत उसके पास नहीं है| वह सोचता रहता है कि एक बार उसे प्रमोशन मिल जाए तो वह संध्या के माता-पिता से बात करे| संध्या के माता-पिता ही नहीं चाल में सभी लोग राजाराम की भलमनसाहत के कारण उसे पसंद करते हैं, पर बहुधा लोग उसके सादे व्यवहार के कारण उसका शोषण भी करते रहते हैं| राजाराम इन बातों का बुरा नहीं मानता और इन छिटपुट घटनाओं के कारण अपना मूल व्यवहार और स्वभाव नहीं बदलता| संध्या किसी रोज उसके घर आ जाए तो वह दिन राजाराम के लिए उत्सवमयी हो जाता है| एकांत में वह अपने मन में संध्या से खूब बातें किया करता है पर संध्या के सामने आने पर उससे अपने मन की बात कहने की उसकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं| दफ्तर में भी राजाराम का शोषण उसके साथ के कमर्चारी करते रहते हैं और इधर उधर के बहाने गढ़ कर अपने काम का बोझा भी राजाराम के सिर डालते रहते हैं| राजाराम भी बिना शिकायत करे अपने काम के साथ इन लोगों का काम भी निबटा दिया करता है| वह किस किस्म का आदर्शवादी है यह इस एक दृश्य से पता चल जाता है|
एक शाम दफ्तर से वह थका हारा लौटा है, बस स्टॉप पर वह कायदे से लोगों की लाइन में खड़ा होता है पर बस आने पर अन्य लोग तो धक्का मुक्की लगा कर बस में चढ़ जाते हैं, नियम कायदे मानने वाला राजाराम सड़क पर ही खड़ा रह जाता है| दो-तीन बसें आकर चली जाती हैं और राजाराम को बस में घुसने का मौका नहीं मिलता| छीनाझपटी करके वह कोई चीज ले नहीं सकता| टैक्सी से जाने लायक खर्चा करने का उसने सोचा भी नहीं, उसके लिए बहुत महंगा है टैक्सी से जाना| तभी एक आदमी बस स्टॉप पर आता है उसके हाथ में चलता हुआ ट्रांजिस्टर है, जिसमें राजाराम सुनता है कि किसी जरुरतमंद को आपाता स्थिति में अस्पताल में ओ-निगेटिव ग्रुप का रक्त चाहिए| वह सड़क पर चिल्लाने लगता है कि उसका खून इसे विशेष ग्रुप का है, वह एक टैक्सी रोकता है और उसे मुंहमांगी रकम पर अस्पताल जाने के लिए राजी कर देता है और खुशी से चिल्लाता हुआ अस्पताल चला जाता है| देर से घर लौटता है डिनर तैयार करता है ताकि खाकर ढंग से सो सके और अगले दिन दफ्तर जा सके|
लोगों के लिए राजाराम एक भावनात्मक और आदर्शवादी मूर्ख है पर वह सच्ची मानवता में भरोसा रखता है और उसे विश्वास है कि जब वह दिल से अच्छा है तो अन्य लोग भी ऐसे ही भले होंगें और क्यों बिना मतलब अन्य लोगों को संदेह की दृष्टि से देखा जाए|
राजाराम की मंथर गति से चलती रूटीन ज़िंदगी में सहसा गत्यात्मक परिवर्तन आते हैं उसके उसके स्कूल सहपाठी बासु (फारुख शेख) के उसके घर में लगभग जबरदस्ती घुस आने से| चलता पुर्जा बासु राजाराम को विवश कर देता है उसे अपने घर में ठहराने के लिए| चतुर बासु शीघ्र ही राजाराम की सारी स्थिति, चाल में रहने वालों की प्रवृतियाँ समझ लेता है और सबको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से चूना लगाने लगता है| वह इतना घाघ है कि सीढ़ी चढ़ रहे बुजुर्ग को सामान सहित सीढियां चढ़ने देता है और बिल्कुल अंतिम पायदान पर सामान उनसे ले लेता है कि उसके रहते वे बोझ कैसे उठा सकते हैं और बुजुर्गवार का दिल जीत लेता है| वह सुबह का नाश्ता किसी के घर, दुपहर का खाना कहीं और, शाम की चाय कोई उसे राजाराम के यहाँ दे जाता है और फिर रात के खाने के समय उसकी दावत किसी और के घर होती है| संध्या को देखते ही वह उसकी सपनीली प्रकृति को भांप लेता है और समझ जाता है कि उसके मन में उसकी वर्तमान ज़िंदगी से बेहतर ज़िंदगी पाने की तमन्ना है| संध्या के माता-पिता की संध्या के विवाह को लेकर लालसा को भी वह देख लेता है| संध्या और उसके माता-पिता सोचते हैं कि उसकी अच्छी जगह शादी हो जाने से संध्या को वह सब कुछ मिल सकेगा जो अभी वे लोग जुटा नहीं पाते|
राजाराम और बासु में जमीन आसमान का अंतर है| राजाराम के लिए प्रेम करना या प्रेम में होना एक पवित्र बात है जबकि बासु के लिए लड़की पटाना और उसे घुमाना फिरना, उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना ही प्रेम है| चालबाज बासु को अच्छे से पता है कि मानव प्रशंसा से बहुत जल्दी पिघलता है| निठल्ला बासु राजाराम से उसके बॉस के बारे में कुछ जानकारियाँ लेकर उसका पीछा करना शुरू कर देता है और ऐसा चक्कर चलाता है कि पचास तरह के झूठ बोलकर राजाराम की कम्पनी में मैनेजर की नौकरी पा जाता है|
लोगों को झांसा देना बासु की फितरत है| बॉस के घर पार्टी में जाने पर वह भांप जाता है कि उसके बॉस और बॉस की पत्नी- अनुराधा (मल्लिका साराभाई) की उम्र में काफी अंतर है| बस इसी का फायदा उठा वह अनुराधा पर भी डोरे डालने लगता है| बॉस की बेटी को देखता है, तो उसे भी शीशे में उतारने की चेष्टा करता है| राजाराम की चाल में वह संध्या को भी अपने जाल में फंसाना चाहता है| संध्या से सच्चा प्रेम करने वाला राजाराम बासु की ऐसी हरकतें सहन नहीं कर पाता और बासु को समझाता है कि संध्या ऐसी लड़की नहीं है और अगर वह वाकई उससे प्रेम करता है तभी उसे संध्या को अपने प्रेम में डालना चाहिए और अगर वह उसकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है तो उसे यह खेल यहीं रोक देना चाहिए|
राजाराम की शराफत, उसका अंतर्मुखी होना, और उसका शर्मीलापन उसे संध्या को चेताने से रोकने पर बासु से जलने वाले की संज्ञा दे जाता है|
बासु एक ही समय में संध्या और अनुराधा से प्रेम की पींगें बढ़ा रहा है और अंतर्मुखी राजाराम के सपने को पैर तले रौंद कर उसी के घर में डेरा डाले बैठा है|
क्या बासु का भेद संध्या और अनुराधा पर खुलेगा?
क्या राजाराम के मौन प्रेम को संध्या समझ और सम्मान दे पायेगी|
जीवन में क्या सच्चा इंसान राजाराम जीतेगा या चलतापुर्जा बासु?
और वास्तव में किसे जीतना चाहिए? ‘कथा’ का सार और संघर्ष यही है|
यह आश्चर्य का विषय है कि अस्सी के दशक में ‘कथा’ के बनने से पहले से ही और उसके बाद तो खासकर हिंदी फिल्मों के नायक बासु जैसे चरित्र के ही हैं, जो नायिका को पटाकर (भांति भांति के तौर तरीके अपनाकर) प्रेम में होने के दावे किया करते हैं और राजाराम जैसे नायक तो ‘कथा’ के बाद हिंदी फिल्मों के धरातल से गायब ही हो गये|
मुख्य कलाकारों जैसे नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख, दीप्ती नवल, मल्लिका साराभाई और विनी परांजपे के बहुत अच्छे अभिनय से फिल्म का स्तर कई गुना बढ़ जाता है| और साहयक भूमिकाओं में नियुक्त अभिनेतागण भी फिल्म को वास्तविक और असरदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते| बम्बई की एक असली चाल में फिल्म को शूट करने से और वहीं के रहने वाले कुछ लोगों को फिल्म में भूमिकाएं देने से फिल्म में वास्तविकता का पुट आ गया है|
सई परांजपे ने बेहतरीन अभिनेताओं का चुनाव अपनी फिल्म के लिए किया| इस फिल्म से पहले तक फारुख शेख सामान्यतः सीधे और साधारण आदमी के किरदार निभाते आए थे और ‘कथा’ में उन्हें चतुर और शातिर फ्लर्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया और उन्होंने इस आकषर्क भूमिका में अपने व्यक्तित्व के आकर्षण को बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया| अकार्शक व्यक्तित्व और लुभावने अंदाज में बोलने वाले चालाक व्यक्ति की भूमिका में फारुख शेख ने शानदार अभिनय किया और परदे पर उनके द्वारा लोगों का दिल जीतते हुए देखना भरपूर विश्वसनीय लगता है|
नसीरुद्दीन शाह ने राजाराम की भूमिका को आत्मिक गहराई के साथ परदे पर साकार कर दिया| और यह उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में से एक है| उनके चरित्र के पास कोई भी ऐसा संवाद नहीं जिससे वे हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों जैसे सर्वशक्तिमान लगें| राजाराम के मनोविज्ञान और उसकी भावनाओं को, उनकी हिचकिचाहट भरी अभिव्यक्ति को, उसके मौन को, उसकी छोटी छोटी खुशियों को, उसके आदर्शवाद को, उसकी ईमानदारी को, उसके मूक प्रेम को, और जिससे उसे प्रेम है उसके संकट काल में उसके साथ दृढता से खड़े होने के आत्मिक बल को, और अन्य बहुत सारे तत्वों को उन्होंने परदे पर एक कुशल जादूगर की भांति प्रस्तुत करके जादू रचा है
दीप्ती नवल ने संध्या का अभिनय नहीं किया वरन वे परदे पर संध्या का जीवन जीती हुयी प्रतीत होती हैं| दीप्ती नवल तो कहीं पीछे रह जाती हैं और दर्शकों को संध्या ही दिखाई देती रहती है|
मल्लिका साराभाई को अमीर, आकर्षक और वक्त पड़ने पर फ्लर्ट का सहारा लेने वाली अनुराधा की भूमिका देकर सई परांजपे ने इस छोटी सी भूमिका को महत्वपूर्ण बना दिया
राजकमल का संगीत अच्छा है, खासकर ‘कौन आया कौन आया’ कोरस गीत तो खासा प्रसिद्द रहा है| कार्टून विधा का फिल्म में रोचक ढंग से इस्तेमाल किया गया है|
सई परांजपे को तीन महत्वपूर्ण हिंदी फिल्मों के निर्देशन के लिए हमेशा ही याद रखा जायेगा| दर्शकों को संवेदना के स्तर पर भीतर तक स्पर्श कर सकने की क्षमता वाली “स्पर्श” और दर्शकों को गुदगुदाकर हंसाने वाली ‘कथा’ और ‘चश्मे-बद्दूर’ तीनों ही फिल्मों को हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक अच्छी फिल्मों में शामिल किया जाता रहेगा|
गीता बाली (हरकीर्तन कौर) का जन्म 30 नवंबर 1930 को सरदार करतार सिंह के यहाँ  विभाजन के पूर्व के अमृतसर -पंजाब में हुआ था ।  इनके पिता मजहबी प्रचारक थे। इस कारण इनके परिवार को बर्मा, लंका, मलया आदि देशों में बराबर जाना पड़ता था। इस कारण गीता बाली की पढ़ाई किसी एक स्कूल में न होकर विभिन्न स्थानों पर हुई। 
गीताबाली ने बतौर बाल कलाकार अपने फि़ल्मी कैरियर की शुरुआत की थी,लगभग 12 साल की उम्र में,बतौर नायिका उनकी पहली फिल्म थी बदनामी जिसने उन्हें स्टार बना दिया था 1951 में भगवान् दादा के साथ आई थी अलबेला जिसके गाने आज भी मशहूर हैं शोला जो भड़के दिल मेरा धडके 1948 में प्रदर्शित सुहाग रात से लेकर 1956 में प्रदर्शित रंगीन रातें तक गीता बाली केदार शर्मा के जीवन की प्रेरणा बनी रहीं। इन नौ साल में गीता बाली के बगैर फिल्म की कल्पना तक उन्होंने नहीं की।
केदार शर्मा गीता बाली से किस कदर अभिभूत और प्रभावित थे, इसका अंदाजा  घटना से सहज लगाया जा सकता है. केदार शर्मा ने फिल्म बनाई थी- बेदर्दी।  वेश्या की कहानी पर बनीं इस फिल्म के नायक थे जसवंत। जसवंत गीता बाली के बहनोई थे। वे गीता बाली के सहारे फिल्मों में हीरो बनने की कोशिश में थे। गीता बाली के अनुरोध पर ही केदार शर्मा को उन्हें बेदर्दी में नायक बनाना पड़ा। उस समय केदार शर्मा ने गीता बाली से कहा था, जसवंत को अभिनय करना बिल्कुल नहीं आता और वे शायद ही फिल्मों में चल पाएं। इस पर उन्हें समझाने के अंदाज में गीता बाली ने कहा-शर्माजी, यह मेरे घर का मामला है। मेरी खातिर उसे हीरो बनाकर पेश कर दीजिए प्लीज। इस प्लीज पर केदार शर्मा कुर्बान हो गए और उन्होंने जसवंत को बेदर्दी में गीता बाली का नायक बना दिया।
इस दौरान गीता बाली और उनकी बहन ने अपनी फिल्म कम्पनी बाली सिस्टर्स की स्थापना की और इसके बैनर में रागरंग  फिल्म शुरू की। यह फिल्म उन्हीं का निर्माण थी। लिहाजा केदारा शर्मा को लगा, इसमें वे जसवंत को ही हीरो बनाएंगी। लेकिन अपने घर के हीरो को परे रख उन्होंने  फिल्म का हीरो बनाया अशोक कुमार को। केदार शर्मा ने गीता बाली से कहा, गीताजी मेरी फिल्म में तो आपने जसवंत को नायक बनाने पर मजबूर किया, लेकिन अपनी फिल्म में आपने अशोक कुमार को लिया। इस पर बीता बोलीं, क्या करें शर्माजी। जसवंत के नाम पर फिल्म बिक नहीं सकती न। मजबूरन अशोक कुमार को लेना पड़ा। गीता बाली ने अपनी फिल्म की मार्केट का खयाल किया और जसवंत को हीरो बनाने के लिए केदार शर्मा को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। यह नुकसान उन्होंने उठाया सिर्फ गीता बाली की खातिर, मगर इसका अफसोस केदार शर्मा को बिलकुल भी नहीं था। बाद में उन्होंने शम्मी कपूर से विवाह कर लिया गीता बाली और शम्मी कपूर की मुलाकात केदार शर्मा की फिल्म रंगीन रातें के सेट पर हुई गीता बाली उन दिनों हिंदी सिनेमा में अपने पैर जमा चुकी थी, जबकि कपूर खानदान से ताल्लुक रखने के बावजूद शम्मी कपूर फि़ल्में हासिल करने के लिए एडियां घिस रहे थे गीता बाली की सिफ़ारिश पर ही शम्मी कपूर को ये फिल्म मिली थी इसलिए जब सेट पर दोनों की मुलाकात हुई तो शम्मी कपूर गीता बाली के स्टारडम के कारण उनसे बात करने में हिचक रहे थे लेकिन जल्द ही दरियादिल गीता बाली ने अपने इस फि़ल्मी हीरो की हिचक को हवा में उड़ा दिया गीता की दरियादिली, बड़ी-बड़ी आँखें और मोहक मुस्कान में खुद को भुला बैठे शम्मी कपूर शम्मी कपूर में एक गजब का अल्हड़पन था ये मस्तमौला गीता को भी रास आने लगा आउटडोर शूटिंग पर रानीखेत गयी रंगीन रातें की टीम और निर्देशक केदार शर्मा की तीखी नजऱों के बीच शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला टीम की वापसी तक पूरा परवान चढ़ चुका था बम्बई अब  मुंबई पहुँचने तक दोनों जीने-मरने की कसम खा चुके थे शम्मी कपूर गीता के साथ शादी की कसम तो खा चुके थे लेकिन उन्हें बखूबी पता था कि ये इतना आसन भी नहीं होगा गीता बाली न केवल उनसे उम्र में बड़ी थी बल्कि वो बावरे नैन में बड़े भाई राजकपूर और आनंदमठ में पिता पृथ्वीराज कपूर की हिरोइन भी रह चुकी थी उस पर शम्मी का हिचकोले खाता फि़ल्मी करियर ज़ाहिर था कि कपूर खानदान शम्मी को शादी की रजामंदी नहीं दे सकता था लेकिन शम्मी थे कि गीता के लिए हर हद्द तोडऩे को तैयार बैठे थे परिवार की नाखुशी उन्हें और बेकरार किये जा रही थी गीता बाली शम्मी की इस परेशानी को समझ रही थी लेकिन वो कर भी क्या सकती थी शम्मी को इस परेशानी से निकला उनके परम मित्र जॉनी वॉकर ने खिलेंदड और मस्तमौला जॉनी उन्हीं दिनों  अफ़ी को अपना बनाकर मुंबई लौटे थे अफ़ी  मिलने की ख़ुशी में जॉनी का जोश पूरे शबाब पर था इसी जोश में उन्होंने शम्मी कपूर को भी अपने पद चिन्हों पर आगे बढऩे की सलाह दे डाली जॉनी ने न केवल सलाह दी बल्कि शम्मी कपूर में इतना आत्मविश्वास भी भर दिया कि वो कपूर खानदान के खिलाफ खिलाफत का झंडा बुलंद करने को तैयार हो गए शम्मी की सलाह हालाँकि गीता बाली को तो जमी नहीं, लेकिन अपने प्यार को पाने का और कोई रास्ता नजऱ भी नहीं आ रहा था बहरहाल, वो तैयार हो गयी 23 अगस्त 1955 की आधी रात को शम्मी कपूर, जॉनी वॉकर, और हरिवालिया के साथ मुंबई स्थित वानगंगा मंदिर में गीता के शादी करने के लिए जा पहुंचे शम्मी कपूर जब मंदिर पहुंचे तो मंदिर के दरवाजे बंद हो चुके थे इसलिए पुजारी ने उनकी शादी कराने से इंकार कर दिया शम्मी की जिद्द और हालात को देखता हुए पुजारी ने उन्हें सुबह आने की सलाह दी और ये आश्वासन भी दिया कि मंदिर के कपाट खुलते ही शादी कि पूरी रस्म अदा कर दी जाएगी सबेरे चार बजे शम्मी मंदिर के सामने हाजिऱ थे गीता को अपना बनाने का उतावलापन और परिवार का डर उनपर इस कदर हावी था कि हड़बड़ी में वो ये भी भूल गए कि शादी के लिए सबसे अहम चीज़ सिंदूर होता है रस्मों-रिवाज़ निपटाने के बाद जब पुजारी ने उन्हें दुल्हन की मांग में सिंदूर भरने को कहा सक्ते में आ गए शम्मी कपूर मौके की नजाकत को देखता हुए गीता ने अपनी लिपस्टिक शम्मी के हाथों में थमा दी और सिंदूर की जगह लिपस्टिक लगाकर ही एक-दूसरे के हो गए।
फिल्म ‘रंगीन रातें के दौरान ही शम्मी कपूर और गीता बाली का साथ प्रेम में बदल गया और 24 अगस्त 1966 को गीता बाली ने शम्मी कपूर से शादी कर ली। शम्मी कपूर और गीता बाली कभी-कभी पत्नी की किस्मत भी पति की तकदीर बदल देती है गीता बाली से शादी करने के बाद जैसे शम्मी की रूठी किस्मत जाग उठी शादी के बाद गीता ने न केवल शम्मी की खिलनदडेपन पर लगाम कसी बल्कि उनके करियर की बागडोर भी अपने हाथों में ले ली गीता बाली के साथ ने न केवल शम्मी को अनुशासित किया बल्कि उनमे एक जि़म्मेदारी भी पैदा की जिसकी वजह से वो करियर को लेकर काफी गंभीर हो गए 1957 में आई नासिर हुसैन की फिल्म तुमसा नहीं देखा की धमाकेदार कामयाबी ने शम्मी के करियर का रुख ही बदल कर रख दिया शम्मी का बदला अंदाज़, लुक और ओ.पी.नेत्रा का म्यूजिक दर्शकों को खूब रास आया और शम्मी रातोंरात स्टार हो गए.. गीता और शम्मी का ये साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सका।
1965 में जब शम्मी फिल्म तीसरी मंजिल की आउटडोर शूटिंग पर थे तो गीता को चेचक हो गयी थी  ।  गीता की बीमारी की खबर सुनकर बदहवासी में अस्पताल पहुंचे शम्मी जब गीता के सामने पहुंचे तो 107 डिग्री फॉरेनहाईट बुखार में तपती गीता उन्हें पहचानने में भी असमर्थ थी आखिरकार उन्हें बचाया नहीं जा सका गीता और शम्मी की इस प्रेम कहानी का अंत उसी मंदिर के पास हुआ जहाँ सात फेरे लेकर दोनों ने साथ जीने-मरने की कसम खायी थी।
इनको बचपन से ही नृत्य का शौक था। नौ वर्ष की उम्र में इन्होंने अपनी बड़ी बहन हरदर्शन कौर के साथ लखनऊ में अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन किया। इनकी जाति के मजहबी सिख लोगों ने शोर-शराबा करने के पश्चात पंडाल के एक भाग को जला भी दिया क्योंकि इनकी जाति के लोग उस समय लड़कियों को नृत्य कला के क्षेत्र में लाना अच्छा नहीं समझते थे। इसके पश्चात तो नन्हीं गीता बाली  आकाशवाणी  ( तब ऑल इंडिया रेडियो ) के बच्चों के प्रोग्राम में बराबर हिस्सा लेती रही।
आकाशवाणी के स्टूडियो में गीता बाली की मुलाकात प्रसिध्द नृत्य निर्देशक पं.ज्ञानशंकर से हो गयी जो पंजाबी फिल्मी क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम था। शौरी पिक्चर्स की फिल्म ‘मोची में पहली बार कोरस की गायिकाओं में उन्हें चांस मिला। इसके पश्चात रूप के.शौरी की फिल्म बदनामी में उनके सोलो नृत्य ने फिल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। लाहौर में महेश्वरी के यहाँ गये और पंचौली की पतझड़ जैसी फिल्मों में गीता बाली के नृत्य काफी पसंद किये गये।  एक प्रख्यात निर्देशक तथा अभिनेता ने लाहौर में इनको देखा और वे इन दोनों बहनों और इनकी माता को बंबई ले आए। केदार शर्मा ने इन दोनों बहनों को देखा। छोटी बहन हरकीर्तन कौर बहुत सुंदर तो न थीं पर उसमें जो अभिनय छटा केदार शर्मा ने देखी, उससे उन्हें विश्वास हो गया कि यह लड़की एक दिन बहुत बड़ी अभिनेत्री बनेगी।
हरकीर्तन कौर (घरेलू नाम- गीता) को निर्देशक केदार शर्मा ने सर्वप्रथम ओरियन्टल पिक्चर्स बम्बई की फिल्म ‘सुहाग रात 1948 में पेश किया। इसमें इनके नायक थे भारत भूषण। संगीतकार थे स्नेहल भाटकर  और गीत लिखे थे  केदार शर्मा ने। इस प्रकार केदार शर्मा ने हरकीर्तन कौर से इनका नाम गीता बाली रख दिया। इसके पश्चात  इनकी फिल्म ‘जलसा  आयी। इसके पश्चात तो इनके अभिनय से सजी फिल्मों की झड़ी सी लग गयी। उन्होंने हर प्रकार के रोल किये। बड़ी बहन में कपटी बहन का रोल और सुहागरात में कम्मो का रोल बखूबी निभाया। फिल्म ‘सुहागरात से ‘रंगीन रातें तक गीता बाली केदार शर्मा के जीवन की प्रेरणा बन रही।
‘रंगीन रातें में तो उन्होंने शुरू से अंत तक पुरुष भेष में ही काम किया। ‘बाजी के निर्देशक गुरुदत्त इसी फिल्म के दौरान इनकी ओर आकर्षित हुए पर गीता बाली ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो गुरुदत्त ने गायिका गीता दत्त से शादी कर ली। केदार शर्मा और गीता बाली के बीच काफी प्रेम अफवाहें फैली लेकिन गीता बाली उन्हें अपना गुरु मानती रहीं। गीता बाली के स्वभाव की विशेषता थी कि वह खुलकर अभिनय करती थीं और खुलकर बातें करती थीं। कई लोग भ्रम में पड़ जाते थे कि वो उनसे प्यार करती हैं।
 यह दुर्भाग्य ही है कि इनको बहुत बड़ी-बड़ी फिल्म न मिल सकी और मिली तो इनको सहनायिका के रोल ही से संतुष्ट होना पड़ा। नूतन की ही तरह इनको भारतीय फिल्मों के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के साथ नायिका बनने का मौका नहीं मिल सका। ज्ञात रहे गीता बाली दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर खान की नायिका बन कर कई फिल्मों में आई।
सुखद जीवन व्यतीत करते-करते गीताबाली के जीवन का अचानक अंत ऐसा हुआ जो किसी भी अभिनेत्री का नहीं हुआ होगा। गीताबाली को चेचक निकली और उन्हें बचाने का बहुत प्रयास किया गया पर प्रकोप कुछ ऐसा हुआ कि अंत में वह उनके प्राण ही लेकर गया। गीता बाली 21 जनवरी 1965 को सबको छोड़ कर सदा-सदा के लिये चली गयी।

Sunday, 20 January 2019





वो सात दिन नहीं थी अनिल कपूर की पहली फ़िल्म !


अगर आपको कहा जाय कि वो सात दिन अनिल कपूर की पहली फिल्म नहीं थी तो जाहिर है आप हैरान होंगें…लेकिन सच यही है कि हमारे झक्कास अदाकार अनिल कपूर की पहली फिल्म वो सात दिन से 6 साल पहले यानि साल 1977- 78 में आयी थी..अनिल कपूर ने अपनी पहली फिल्म की थी संजीव कुमार और राखी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ….फिल्म का नाम था हमारे तुम्हारे.. फिल्म में अनिल ,संजीव कुमार और राखी के 11 बच्चों में से एक बच्चे बने थे..लेकिन अगर आपको लग रहा है कि इसके बाद उन्होने वो सात दिन की थी तो एक बार फिर आप गलत हैं..क्योंकि हमारे तुम्हारे और वो सात दिन के बीच करीब आधा दर्जन फिल्में और भी आयीं.. उनमें खास रही एक बार कहो की…जिसमें शबाना आज़मी भी थीं. साथ ही वो एम एस सथ्यू की कहां कहां से गुजर गया के अलावा तेलुगु और तमिल फिल्मों में भी नजर आये.. एक और दिलचस्प बात ये है कि वो पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट के एक्टिंग कोर्स में फेल हो गये तो उन्होने जाने माने एक्टिंग गुरु रोशन तरनेजा के साथ एक्टिंग क्लासेज की..और तब कहीं जाकर 1983 में उनकी फिल्म वो सात दिन रिलीज़ हुई जिसे ज्यादातर लोग उनकी पहली फिल्म समझते हैं।


बेकस की तबाही के-सोने की चिड़िया 1958

ये गीत एक मास्टरपीस गीत है. साहिर लुधियानवी के बोल, नूतन 
की अदायगी, आशा की आवाज़ और ओ पी नैयर का संगीत है. ये
गीत निस्संदेह आशा भोंसले के बेहतर गीतों में से एक है.

हर इंसान भीड़ में अकेला है. इस फिल्म की नायिका बचपन में
कष्टों के दौर से गुजर कर एक सितारा बन जाती है. इसके बाद 
भी उसका शोषण होता है और वो है आर्थिक शोषण. फिल्म का 
शीर्षक इसलिए ऐसा है. गीत शिकायात वाला है. नायिका एक 
असामाजिक तत्व से बचते हुए भागती हुई थियेटर के स्टेज पर 
पहुँच जाती है और गाना गा रही है. 

गीत की एक पंक्ति ‘मोती की तरह प्यासे’ नायिका की पूरी व्यथा 
जाहिर कर देती है. सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे कितना दर्द 
छुपा हुआ है ये एक आम आदमी नहीं समझ सकता. 




गीत के बोल:

बेकस की तबाही के सामान हज़ारों हैं
दीपक तो अकेला है तूफ़ान हज़ारों हैं
तूफ़ान हज़ारों हैं
बेकस की तबाही के सामान हज़ारों हैं
दीपक तो अकेला है तूफ़ान हज़ारों हैं
तूफ़ान हज़ारों हैं

लाचार किया हमको लाचार किया हमको
दुख दर्द जलन आँसू क्या क्या ना दिया हमको
क्या क्या ना दिया हमको
भगवान तेरे हम पर एहसान हज़ारों हैं
भगवान तेरे हम पर एहसान हज़ारों हैं
दीपक तो अकेला है तूफ़ान हज़ारों हैं
तूफ़ान हज़ारों हैं

सूरत से तो इन्सां हैं दुश्मन हैं मुहब्बत के
सब चोर हैं डाकू हैं माँ बहनों की इज़्ज़त के
सूरत से तो इन्सां हैं दुश्मन हैं मुहब्बत के
सब चोर हैं डाकू हैं माँ बहनों की इज़्ज़त के
माँ बहनों की इज़्ज़त के
कहने को ज़माने में इन्सान हज़ारों हैं
कहने को ज़माने में इन्सान हज़ारों हैं
दीपक तो अकेला है तूफ़ान हज़ारों हैं
तूफ़ान हज़ारों हैं

हमदर्द नहीं मिलता फिर आये जहाँ भर में
हमदर्द नहीं मिलता फिर आये जहाँ भर में
मोती की तरह प्यासे रोते हैं समन्दर में
मोती की तरह प्यासे रोते हैं समन्दर में
अपना ही नहीं कोई अनजान हज़ारों हैं
अपना ही नहीं कोई अनजान हज़ारों हैं

इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए-प्यार की जीत 1948

फिल्म प्यार की जीत से रफ़ी का दर्द भरा गीत सुनते हैं. जिसके
पास दिल हो वही बतला सकता है दिल के टुकड़े सौ हुए या हज़ार.
ये तो कविता शेर शायरी वाली बात हो गई. असल में तो बिना दिल 
के मतलब बॉडी के पम्पिंग स्टेशन के बिना जीवन की कल्पना ही 
नहीं की जा सकती.  

कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा पञ्च लाइन है गीत की. यह गीत 
लिखा है कमर जलालाबादी ने और इसकी धुन हुस्नलाल भगतराम 
ने बनाई है. 




गीत के बोल:

इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए
इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा 
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा
बहते हुए आँसू रुक न सके
बहते हुए आँसू रुक न सके
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा 

जीवन के सफ़र में हम जिनको 
समझे थे हमारे साथी हैं
जीवन के सफ़र में हम जिनको 
समझे थे हमारे साथी हैं
दो क़दम चले फिर बिछड़ गए
दो क़दम चले फिर बिछड़ गए
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा 

आशाओं के तिनके चुन-चुन कर 
सपनों का महल बनाया था 
आशाओं के तिनके चुन-चुन कर 
सपनों का महल बनाया था
तूफ़ान से तिनके बिखर गए
तूफ़ान से तिनके बिखर गए
कोई यहाँ गिरा …

Saturday, 19 January 2019

Bombai ka Babu(1960) : सुचित्रा सेन के लिए देव आनंद सगा भाई है, पर देव सुचित्रा में प्रेमिका खोजता है

BombaikaBabu-001देव आनंद अभिनीत राज खोसला दवारा निर्देशितबम्बई का बाबू फिल्म की कहानी में राजिंदर बेदीऔर एम.आर कामथ ने O Henry की कहानी A Double Dyed Deceiver से प्रेरित प्रसंगों को रखा और इसमें इनसेस्ट के कोण का मिश्रण करके हिंदी सिनेमा के लिए इसे एक बिल्कुल भिन्न फिल्म बना दिया जिसके कथानक की बराबारी न तो इससे पहले बनने वाली हिंदी फ़िल्में कर सकती हैं न बाद में बनने वाली| सत्तर के दशक में जब बी.आर.चोपडा के सुपुत्र रवि चोपडा ने निर्देशन की कमान संभाली तो उन्होंने बम्बई का बाबू के कथानक को कम तनाव उत्पन्न करने वाला बनाकर अमिताभ और सायरा बानो को लेकर जमीर फिल्म का निर्माण किया|
भाई बहन के आदर्श रूप पर जाएँ तो सतह पर फिल्म में इनसेस्ट का पुट है लेकिन यह फिल्म का मकसद नहीं कि हॉलीवुड की फिल्मों The Cement Garden और Desire Under the Elms की भांति इनसेस्ट को खंगालें, बल्कि यहाँ फिल्म नायक नायिका के मध्य एक गलतफहमी, जिसे नायक तो जानता है अतः उसके दिमाग में सब कुछ स्पष्ट है, परन्तु नायिका सच से अनभिज्ञ है अतः तनावग्रस्त है, के कारण उपजी तनावग्रस्त स्थितियों में उनके मानसिक संघर्षों को दर्शाने का लक्ष्य लेकर चलती है|
ऐसा मानसिक द्वंद पहले एल.वी प्रसाद की राजकपूर और मीना कुमारी अभिनीत फिल्म – शारदा में दिखाई दिया था पर वहाँ आधुनिकता का अभाव था| बम्बई का बाबू एक अलग ही राह लेकर चलती है और दर्शकों के दिमाग को मथती हुयी आखिर के 10-15 मिनटों में तो दर्शक को एक तनाव के एक तीव्र आवेग से भर देती है जहां दर्शक फिल्म का ही सक्रिय हिस्सा बनकर नायक नायिका के साथ क्या होगा इसकी चिंता से भर जाता है|
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी इसका एक बेहतरीन पहलू है| फिल्म के शुरुआत में जैसे ही बाबू (देव आनंद) जेल से बाहर आकर बाली (जगदीश राज) के साथ कार में बैठता है, कैमरा दर्शक को एक रोमांचकारी यात्रा पर ले जाता है और दर्शक को ऐसा प्रतीत होता है वह भी बाबू और बाली के साथ उस कार में ही बैठ गया है और कार के सीमित स्पेस से ही वह बाहर की दुनिया को देख रहा है| |
कलाकारों और फिल्म निर्माण से जुडी टीम के अन्य सदस्यों के नाम परदे पर कार की विंड स्क्रीन के ऊपर और नीचे उभरते रहते हैं और विंड स्क्रीन के जरिये दर्शक को बम्बई की चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों को कैमरा दिखाता रहता है|
एक बेसमेंट में पहुँच कर जबकि ऐसा लगने लगता है कि अब सारे अपराधी किस्म के तत्व मौज मस्ती में मशगूल हैं सो शायद एक क्लब जैसा गीत यहाँ उभरेगा, अचानक ही स्थितियां करवट लेती हैं और हंगामे को सहन करने के जब दर्शक को साँस लेने की फुर्सत मिलती है तब बाबू पुलिस से बचने के लिए भाग रहा है, उस पर एक ह्त्या करने का आरोप लग चुका है|
परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि पुलिस से बचते बचाते वह एक ऐसे पहाड़ी गाँव में पहुँच जाता है जहां एक भगत (Rashid Khan) नाक का शातिर उसकी सच्चाई भांप कर उसे अपने जाल में फंसा लेता है और उसे ब्लैकमेल करके उसे अपनी योजना का हिस्सा बनाकर गाँव के मुखिया शाह जी (Najir Hussain) और उनकी अंधी हो चुकी पत्नी रुक्मणि (Achala Sachdev) का खोया हुआ बेटा- कुंदन, बनाकर गाँव में भेज देता है| कुंदन जब 5 साल का था तब गायब हो गया था और अब 20 साल बाद वह वापिस आया है| कुंदन (देव आनंद) के कहानी गढ़कर सब गाँव वालों को सुना देता है और उन्हें विश्वास दिला देता है कि वही कुंदन है| कुंदन का प्रयोजन धनवान शाह जी की तिजोरी से रुपया और जेवरात आदि चुराकर वहाँ से चले जाना है| पर नियति को अभी कुछ और भी उसके जीवन में लाना है!
कुंदन के दिमाग में सिर्फ शाह जी की धन-संपत्ति पर हाथ साफ़ करने की बात है पर उसके विचारों को झटका लगता है जब वह शाह जी की बेटी माया (Suchitra Sen) से मिलता है जो बीस साल बाद अपने भाई को देखकर अति प्रसन्न है|
अब शाह दंपत्ति और माया के लिए तो कुंदन माया का सगा भाई है लेकिन सच तो बाबू को पता है कि वह कुंदन नहीं है और इसीलिये वह अपने अंदर माया के प्रति उत्पन्न प्रेम के भावों को रोक नहीं पाता|
उसके मन के अंदर संघर्ष चलने लगते हैं| माया तो उसके साथ जंगल पहाड़ों में मुक्त रूप से यह सोचकर विचरण करती है कि वह उसका भाई है, जिसकी कमी उसे बचपन से खलती राही है और कुंदन माया की शारीरिक सुंदरता को और उसकी नजदीकी को और ही निगाहों से देखता है और महसूस करता है और उसका स्पर्श वह एक प्रेमी की तरह ही करता है| इससे पूर्व हिंदी फिल्मों में कैमरे ने नायक को नायिका के शारीरिक सौंदर्य को इस तरह निहारते और महसूस करते कभी नहीं दिखाया था और उस जमाने के प्रचलन के लिहाज से यह एक बोल्ड कदम था|
स्त्री पुरुष के देखने और उसके दवारा स्पर्श किये जाने के अंतर को पहचानने में कभी कभी ही भूल कर सकती है अन्यथा वह तुरंत पहचान लेती है कि उसे देखने वाली निगाहें कैसे हैं और उसे किया गया स्पर्श किन भावों से भरा हुआ है| कुंदन की निगाहें और उसके स्पर्श उसे अजीब लगते हैं लेकिन वह नजरंदाज करती है इन संदेहों को|
घर पर भी कुंदन माया के संग वे सब हरकतें करता है जो एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ करता है और यहाँ तक कि माया दवारा उसे राखी बांधे जाने के प्रयास को भी वह विफल कर देता है, और माया पर दबाव डालता है कि वह उसे भईया न कह कर उसका नाम लेकर उसे संबोधित किया करे| ऐसा नहीं कि वह अंदर से बदल नहीं रहा| माया के प्रति प्रेम, और वृद्ध शाह दंपत्ति दवारा उसे निश्छल प्रेम दिए जाने और उस पर अति विश्वास किये जाने से वह वही बाबू नहीं बचता जिसे भगत ने कुंदन बना कर एक योजना के तहत गाँव में भेजा था|
माया के प्रति उसकी दीवानगी बढ़ती जाती है और शाह जी दवारा उससे माया के विवाह की बात किये जाना उसके सब्र का प्याला छलका देता है| उसके अंतर्द्वंद की तीव्रता तब और बढ़ जाती है जब उसे पता लगता है कि असली कुंदन की मौत उसी के हाथों बम्बई में हुयी थी!
वह बहुत गहरे मानसिक संघर्षों में उलझ जाता है जिससे उसे अपना अस्तित्व ही हिलता हुआ दिखाई देता है|
क्या वह माया और उसके वृद्ध माता-पिता को सच्चाई बताएगा कि वह कुंदन नहीं बल्कि उसका हत्यारा है?
क्या माया से एक प्रेमी की तरह प्रेम करने की खातिर वह माया का विवाह कहीं और होने से रोकेगा?
वह क्या करेगा?
और सच्चाई खुल कर बताने से माया उसे प्रेमी के रूप में स्वीकारेगी? खासकर इस सच्चाई को जानने के बाद कि वही उसके खोये हुए भाई का हत्यारा है?
आजकल जिस तरह की बंदिशें, नैतिकता के नाम पर फ़िल्मी दुनिया पर समाज के स्वयंभू ठेकेदारों ने लाद दी हैं उससे यह संभव नहीं लगता कि आजऐसी बोल्ड थीम पर फिल्म बने तो उसे सेंसर का प्रमाणपत्र लेने दिया जायेगा या अगर मिल भी जाए तो उसे थियेटर में आसानी से चलने दिया जायेगा|
पचास और साठ के दशक के सुपर स्टार देव आनंदने उन दशकों में फिल्म के कथानकों के हिसाब से कई मर्तबा नई परिपाटी पर चलने का साहस दिखाया था और यही उनकी फिल्मोग्राफी को अपने से ज्यादा समर्थ अभिनेता दिलीप कुमार के समक्ष मुकाबले में ला खड़ा करता है| नैतिकता और प्रेम के बेच संघर्ष में मानसिक द्वंदों से जूझ रहे इंसान के चरित्र को बहुत प्रभावी ढंग से देव आनंद ने परदे पर साकार कर दिया है| बम्बई का बाबू में अपराध, सजा और पश्चाताप के मकडजाल में फंसे बाबू/कुंदन के चरित्र में देव आनंद ने वह सब कुछ फिल्म को समर्पित किया है जो इस जटिल चरित्र को परदे पर साकार करने के लिए आवश्यक था|
सुचित्रा सेन ने बहुत कम हिंदी फ़िल्में कीं पर जब भी कीं वे उन्हें एक महान अभिनेत्री ठहराने का सुबूत ही बन कर उभरीं| हिंदी फिल्मों में उनकी उपस्थिति से हिंदी फिल्मों का इतिहास ही समृद्ध हुआ| सुचित्रा सेन ने परदे पर अपने किरदार में वह दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है जिस पर कि यह विश्वास सहज ही हो जाता है कि बाबू/कुंदन इस स्त्री के लिए सामाजिक परिभाषाओं को आसानी से चुनौती दे सकता है|
राजिंदर बेदी ने देव आनंद और सुचित्रा सेन के मध्य ऐसे दृश्य और ऐसे संवाद रचे हैं कि वे फिल्म की रीढ़ बन जाते हैं| एक उदाहरण –
जंगल में माया के साथ विचरते हुए कुन्दन फूल तोड़कर माया के बालों में लगा देता है| माया चौंक जाती है और ठिठक कर दूर होकर शिकायत करती है,”तुम कैसे अपनी बहन के बालों में फूल लगा सकते हो?”
कुंदन- पर तुम एक स्त्री भी तो हो और स्त्री का सौंदर्य बालों में फूल लगाकर और बढ़ जाता है|
क्रोधित माया- स्त्री और बहन में अंतर नहीं होता?
जाल मिस्त्री का कैमरा प्रकाश और छाया के साथ बहुत से प्रयोग करता है और वातावरण के विभिन्न भावों को प्रस्तुत करता है| भगत के किरदार का असर बढाने के लिए उसे हमेशा ही बादलों जैसे वातावरण के पीछे छिपाकर प्रस्तुत किया गया है|
फिल्म के संगीत की तो बात क्या की जाए, मजरूह सुल्तानपुरी ने गजब गीत लिखे और सचिन देब बर्मन ने ऐसी धुनें बनाई हैं जो पचास साल भी ताजगी की एहसास फिजां में घोल देती हैं| यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में सबसे अच्छे कुछ कोरस गीतों में बम्बई का बाबू के दो गीत शामिल हैं| मुकेशमुहम्मद रफ़ीऔर आशा भोसले को उल्लेखनीय गीत मिले और उन्होंने महान प्रस्तुतियाँ दीं|
राज खोसला ने ऐसी शानदार फिल्म बनाई कि इस गैर-सामान्य कथानक और सिनेमाई ट्रीटमेंट फिल्म के चाहने वाले इसे बार बार देखना पसंद करते हैं और जो एक बार भी देख ले इसका मुरीद बन कर रह जाता है|
द्वितीय महायुद्ध के समय की बात है। ओमप्रकाश को रावलपिण्डी से लाहौर तक का सफर करना था। फ़ौज़ी जवानों से ठसाठस भरी रेलगाडिय़ां, और उस भीड़ के बावजूद यात्रा की अनिवार्यता। तीसरे दर्जे़ का रेल-टिकट था ओमप्रकाश के पास, और घुसने की जगह थी मात्र पहले दर्जे़ में और वह भी तीन-चार अंग्रेज सैनिकों के मध्य। मजबूरन उसी डिब्बे में घुसकर जगह बनाने की कोशिश कर डाली ओमजी ने, और अपने उन प्रयत्नों में उनको किंचित सफलता भी मिली। सैनिक अधिकारी अपने अनजाने, अनचीन्हें लहज़े में गिटपिट किये जा रहे थे उस समय, और ओमप्रकाश उनकी उस अंग्रेजी से सर्वथा अनभिज्ञ यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिऱ किस तरह वह उन लोगों की बातचीत में कोई हिस्सा लें। तभी उनके दिमाग़ में आया क्यों न उन लोगों के सामने गूँगे का अभिनय कर डाला जाये? इज़्ज़त तो कम से कम बच ही जायेगी ऐसा करने से। और किस्सा-कोताह यह कि खानपान, सुरासेवन आदि के बाद फ़ौज़ी अफ़सरों ने जब ओमप्रकाश से पूछा कि क्या वह जन्म से ही गूंगे हैं तो ओमजी ने इस खबसूरती से अपना सर हिलाया जिससे न यह मालूम हो सकता था कि वह गूंगे हैं और न यही कि वह गूंगे नहीं हैं। सैनिक अधिकारियों के मन में उनके प्रति सहानुभूति जगी उन्होंने ओमजी को न सिफऱ् भरपूर खिलाया-पिलाया  लेटने के लिये एक पूरी बर्थ भी उनके हवाले कर दी सुबह होने पर अँग्रेजी ढंग का ब्रेकफ़ास्ट भी उनको मिला और ख़ूब मज़े के साथ उनकी वह यात्रा सम्पन्न हो गयी। लेकिन लाहौर पहुंचने पर इस अभिनय का पटाक्षेप जब हुआ तो वह सैनिक अधिकारी भी हंसी से सराबोर हो उठे जिन्होंने अपंग समझ कर ओमप्रकाश की इतनी खातिरबाजी की थी। हुआ यह कि जो व्यक्ति ओमजी को लेने स्टेशन आया था उसने पूछ ही लिया ‘कहो बर्खुरदार, सफऱ कैसा कटा? सैनिक अधिकारी घूर घूर कर ओमजी की ओर देखते जा रहे थे, और ओम थे कि उनकी ज़बान ही सिमटती जा रही थी। तभी, अपने आत्मविश्वास का संचय करते हुए ओमप्रकाश बोल उठे ‘माफ़ कीजिएगा, बिरादरान, आप लोगों की यह लंगड़ी अँग्रेजी मेरे भेजे के अन्दर नहीं घुस पा रही थी, इसीलिये मुझे गूंगे का अभिनय करना पड़ गया। वैसे यह न समझ लीजिएगा कि अँग्रेजी ज़बान मुझे नहीं आती, मैं भी लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ चुका हूं और उनकी इस बात को सुनते ही उपस्थित लोगों के मध्य हंसी का जो दौर-दौरा शुरू हुआ था उसकी समाप्ति ओमजी के स्टेशन छोडऩे के बाद ही हो पायी।
हिन्दी फि़ल्म जगत में ओमप्रकाश का प्रवेश फि़ल्मी अंदाज में हुआ। वह अपने एक मित्र के यहां शादी में गए हुए थे, जहां पर ‘दलसुख पंचोली ने उन्हें देखा और तार भेजकर उन्हें लाहौर बुलवाया। दलसुख पंचोली ने फि़ल्म ‘दासी(1950) के लिए ओम प्रकाश को 80 रुपये वेतन पर अनुबंधित कर लिया। यह ओमप्रकाश की पहली फि़ल्म थीं।

Friday, 18 January 2019

   रीना का असली नाम रूपा है। रीना के पिता मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे जबकि उनकी मां हिन्दू परिवार से थी।  वह अपने माता पिता की तीसरी संतान है।  उनके माता-पिता लम्बे समय तक साथ नहीं रह पाए थे, क्योंकि दोनों में अलगाव हो गया था।  उन्होंने बहुत कम उम्र में अपना फि़ल्मी करियर शुरू कर दिया था, जिससे की वह अपनी माता और भाई बहनों को सहयोग कर पायें। 
7 जनवरी 1957 को को जन्मी रीना रॉय को सर्वप्रथम बी.आर. इशारा की फिल्म नई दुनिया नए लोग में काम करने का प्रस्ताव मिला। इस फिल्म में रीना रॉय के अपोजिट डैनी थे लेकिन कुछ कारणों से यह फिल्म थोडे समय के लिए रूक गई। बाद में यह फिल्म 1973 में प्रदर्शित हुई लेकिन सफल नहीं रही। बी.आर. इशारा ने एक बार फिर से रीना और डैनी को अपनी फिल्म जरूरत में काम करने का अवसर दिया। 1972 में रिलीज फिल्म जरूरत बॉक्स ऑफिस पर कोई खास करिश्मा नहीं दिखा सकी लेकिन रीना रॉय फिल्म इंडस्ट्री में जरूरत गर्ल के नाम से मशहूर हो गई। 1973 में रीना रॉय को जीतेन्द्र के साथ जैसे को तैसा में काम करने का मौका मिला जो उनके करियर की पहली सुपरहिट फिल्म साबित हुयी।
1976 रीना रॉय के करियर के लिए अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी नागिन और कालीचरण जैसी सुपरहिट फिल्में प्रदर्शित हुयी। राजकुमार कोहली के निर्देशन में बनी फिल्म नागिन में रीना राय ने इच्छाधारी नागिन की दमदार भूमिका निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। इस फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए रीना राय सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित की गई। नागिन की ब्लॉबस्टर कामयाबी के बाद रीना रॉय इंडस्ट्री की टाप अभिनेत्रियों में शुमार हो गई। नागिन की सफलता के बाद रीना राय राजकुमार कोहली की प्रिय अभिनेत्री बन गयी। इसके बाद राजकुमार कोहली ने रीना राय को मुकाबला, जानी दुश्मन, बदले की आग और राजतिलक जैसी सुपरहिट फिल्मों में काम करने का अवसर दिया। 
1977 में रिलीज फिल्म अपनापन रीना राय के करियर की उल्लेखनीय फिल्मों में शमिल है। इस फिल्म के लिए रीना को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। रीना राय की जोडी शत्रुघ्न सिन्हा और सुनील दत्त के साथ काफी पसंद की गई। रीना राय ने सत्तर और अस्सी के दशक में अपनी बोल्ड अदाओ से दर्शकों को अपना दीवाना बनाया था। जे.पी.दत्ता की फिल्म रिफ्यूजी में रीना राय ने आखिरी बार काम किया। राय ने अपने करियर में 100 से अधिक फिल्मों में काम किया है। इनके अलावा जख्मी, विश्वनाथ, बदलते रिश्ते, कर्मयोगी, गौतम गोविन्दा, आशा, सौ दिन सास के, नसीब, हथकड़ी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, बेजुबान, दर्द का रिश्ता, नौकर बीबी का, गुलामी, आदमी खिलौना है आदि। – बॉलीवुड में ‘शॉट गन के नाम से मशहूर शत्रुघन सिन्हा और रीना रॉय की जोड़ी बेहद हिट मानी जाती है, इन्होंने एक साथ काफी अच्छी और हिट फिल्में दी है। 
1983 में रीना की प्रसिद्धी अपने पूरे चरम पर थी, उस वक्त उन्होंने फि़ल्मी दुनिया को छोड़कर पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान से शादी करने का फैसला किया. शादी से पहले 1984 में आई फिल्म ‘इन्तहा उनकी आखिरी फिल्म थी. जीनत अमान के पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान के अफेयर के अलावा बॉलीवुड एक्ट्रेस रीना रॉय का पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान के साथ अफेयर काफी चर्चा में रहा था। मंसूर अली खान पटौदी और शर्मिला टैगौर के बाद यह दूसरा ऐसा कपल बना जिनका प्यार शादी तक पहुंचा। हालांकि ये अलग बात है कि दोनों का रिलेशनशिप उनकी तरह लंबा नहीं चला। शत्रुघ्न सिन्हा से प्यार में धोखा खाने के बाद रीना रॉय की मुलाकात पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान से हुई थी। इनकी मुलाकात कब हुई औऱ कैसे हुई इसकी सही जानकारी कहीं मौजूद नहीं हैं । लेकिन दोनों ने 1983 में शादी कर ली थी। जिस समय दोनों की शादी हुई उस समय रीना रॉय का जादू बॉलीवुड में छाया हुआ था और मोहसिन भी क्रिकेट करियर भी ठीक चल रहा था। लेकिन मोहसिन के प्यार में रीना इस कदर दीवानी थी कि उन्होंने फिल्मों को अलविदा कहने का फैसला लिया। मौहसीन खान ने भी कुछ ऐसा ही किया, मोहसिन ने रीना से शादी करने के लिए क्रिकेट को छोडऩे का फैसला किया था और वह इंडिया आकर रीना रॉय के साथ रहने लगे । 
यही नही उन्होंने बतौर एक्टर फिल्मों में भी काम किया लेकिन फिल्में चली नहीं। एक दूसरे के लिए सब कुछ छोड़ देने के बाद भी शायद उन्हें वो नहीं मिला जो वो चाहते थे और उनकी सारी कोशिश नाकाम साबित हुई। कुछ टाईम तक साथ में रहने के बाद दोनों की शादी टूट गई। इस की एक वजह यह भी मानी जाती है कि इस शादी से मोहसिन के परिवार वाले खुश नहीं थे। रीना रॉय से अलग होने के बाद मौहसीन खान वापस पाकिस्तान चले गए थे। हालांकि उनकी शादीशुदा जिंदगी ज्यादा दिनों तक खुशहाल नहीं रह सकी. उन्होंने अपने पति से तलाक लिया, जिसमें वह अपनी बेटी सनम की कस्टडी से हाथ धो बैठी। कुछ समय बाद उनके पति ने फिर से शादी कर ली, और उन्हें अपनी बेटी की देखरेख का जिम्मा वापस मिल गया। 
1972 से 1985 तक रीना रॉय फिल्मों में काम करती रही थी। जब उनका कैरियर टॉप पर था तब उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान से शादी कर ली थी। मोहसिन खान ने बतौर नायक कई हिंदी फिल्मों में काम किया पर वे कामयाब नहीं हुए। रीना रॉय मोहसिन खान अलग हो गए। रीना रॉय पाकिस्तान से भारत लौट आई फिल्मों में उनको फिर कामयाबी नहीं मिली। 1992 में आई फिल्म ‘भाभी में सपोर्टिंग रोल से फिर वापसी की थी, उसके बाद उनकी 1993 में आई फिल्म ‘आदमी खिलौना है खासी चर्चा में रही ।  उनकी आखिरी फिल्म  2000 में आई ‘रिफ्यूजी थी। 
    ~आखिरी वक्त वृद्धाश्रम में गुज़रा था~
    दुलारी हिंदी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। हिंदी सिनेमा में मां का ज़िक़्र होते ही दुर्गा खोटे, ललिता पवार, लीला चिटनिस, निरुपा रॉय, कामिनी कौशल और सुलोचना जैसी अभिनेत्रियों के चेहरे ज़हन में घूमने लगते हैं। इन तमाम अभिनेत्रियों की छवि भले ही फ़िल्मी मां की हो लेकिन हिंदी सिनेमा के सुनहरी दौर के दर्शक इस बात से वाक़िफ़ हैं कि इन सभी ने अपने कॅरियर की शुरुआत बतौर हिरोईन की थी और इनमें से कुछ का शुमार तो अपने दौर की कामयाब हिरोईनों में किया जाता था। इसी सूची में एक नाम है दुलारी का, जिन्हें आमतौर पर दर्शक एक सीधी-सादी और ग़रीब फ़िल्मी मां के तौर पर जानते हैं। दुलारी ने भी शुरुआती कुछ फ़िल्में बतौर हिरोईन और साईड हिरोईन की थीं और ‘आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे’ और ‘जवानी की रेल चली जाए’  ज़बर्दस्त हिट गीत भी दुलारी पर ही फ़िल्माए गए थे।
दुलारी का जन्म 18 अप्रॅल 1928 को नागपुर में हुआ था। दुलारी जी के अनुसार, उनके पूर्वज पीढ़ियों पहले अवध क्षेत्र से आकर नागपुर में बस गए थे। अपने माता-पिता की दुलारी पहली संतान थीं और घर में उनसे छोटे दो भाई थे। यूँ तो दुलारी जी का नाम अम्बिका रखा गया था, लेकिन घर में उन्हें सब राजदुलारी कहकर पुकारते थे जो आगे चलकर सिर्फ़ ‘दुलारी’ रह गया। उनके पिता विट्ठलराव गौतम डाकतार विभाग में नौकरी करते थे, लेकिन अभिनय का उन्हें इतना शौक़ था कि अभिनेत्री अरुणा ईरानी के नाना की नाटक कंपनी जब नागपुर आई तो नौकरी छोड़कर वे उस कंपनी के साथ मुंबई आ गए। ये 1930 के दशक के शुरू का समय था।
‘नेशनल स्टूडियो’ को सोहराब मोदी की कंपनी ‘मिनर्वा मूवीटोन’ ने ख़रीदा तो उन्होंने दुलारी को 7 साल के लिए नौकरी पर रखना चाहा। लेकिन कांट्रेक्ट की कुछ शर्तें मंज़ूर न होने की वजह से दुलारी ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘हमारी बात’ में उन्होंने हीरो जयराज की छोटी बहन की भूमिका की तो ‘अमर पिक्चर्स’ की ‘आदाब अर्ज़’ में वे बतौर सहनायिका नज़र आयीं, जिसमें उनके हीरो गायक मुकेश थे। ये दोनों ही फ़िल्में 1943 में बनी थीं।
अगले क़रीब 35 सालों में दुलारी ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘मुझे जीने दो’ ‘अपने हुए पराए’ ‘आए दिन बहार के’, ‘अनुपमा’, ‘तीसरी क़सम’, ‘पड़ोसन’, ‘आराधना’, ‘आया सावन झूम के’, ‘चिराग़’, ‘इंतक़ाम’, ‘आन मिलो सजना’, ‘हीर रांझा’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘कारवां’, ‘लाल पत्थर’, ‘बेईमान’, ‘सीता और गीता’, ‘राजा रानी’, ‘अमीर ग़रीब’, ‘हाथ की सफ़ाई’, ‘दीवार’, ‘दो जासूस’, ‘आहुती’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘बीवी ओ बीवी’, ‘नसीब’, ‘रॉकी’, ‘प्रेम रोग’, ‘अगर तुम न होते’ और धर्माधिकारी 135 फ़िल्मों में छोटी-बड़ी चरित्र भूमिकाओं में नज़र आयीं। 
एक इंटरव्यू में दुलारी जी का कहना था, “बढ़ती उम्र के साथ बिगड़ती सेहत का असर मेरे काम पर भी पड़ने लगा था। 1989 में बनी फ़िल्म ‘सूर्या’ के एक सीन में मुझे 200 जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ के साथ दौड़ना था। निर्देशक इस्माईल श्रॉफ़ के एक्शन कहते ही मैंने दौड़ना शुरू किया। लेकिन गठिया की बीमारी की वजह से मैं कुछ ही दूर जाकर गिर पड़ी। जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ मेरे पीछे दौड़ी चली आ रही थी। अभिनेता सलीम ग़ौस ने, जो मेरे बेटे की भूमिका में थे, बहुत मुश्किल से मुझे कुचले जाने से बचाया, और इस प्रयास में उन्हें भी हल्की चोटें आयीं। ऐसे में मैंने रिटायरमेंट ले लेना ही बेहतर समझा। फिर कई साल बाद निर्देशक गुड्डू धनोवा के आग्रह पर उनकी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में  भूमिका की। इस तरह  1997 में रिलीज़ हुई ‘ज़िद्दी’ मेरी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई।”
दुलारी जी के पति का निधन 1972 में हुआ। उनकी इकलौती बेटी की शादी हो चुकी थी। अभिनय से सन्यास लेने के बाद कुछ समय तो वे मुंबई में अकेली रहीं। 2002 में अपनी बेटी के पास इंदौर चली गयीं। दुलारी जी का आखिरी वक्त पुणे के वृद्धाश्रम में गुज़रा था।अभिनेत्री वहीदा रहमान ने दुलारी जी की काफी सहायता की थी। अपने आखिरी दौर में पिछले काफ़ी समय से अल्ज़ाईमर की बीमारी से पीड़ित हो गयी थी। 85 साल की दुलारी जी को दिसंबर 2012 के आख़िरी सप्ताह में पूना के एक अस्पताल में आई.सी.यू. में दाख़िल कराया गया था, जहां 18 जनवरी, 2013 को उनका देहांत हो गया। 

झूलना झुलाओ – शायद उनका गाया हुआ ये पहला गीत था. 

     कुंदन लाल सहगल  अपने गाये करीब ढ़ाई सौ गानों के ज़रिये अवाम में आज भी ज़िंदा हैं । जब तक अच्छा संगीत सुननेवाले इस दुनिया में रहेंगे तब तक सहगल की आवाज़ हमेशा फ़ज़ा में गुंजेगी । अपने छोटे से जीवनकाल –04 अप्रैल 1904 से 18 जनवरी 1947– यानी गायकी जीवन के पंद्रह से भी कम सालों में गिनी चुनी फिल्में और इतने कम गानों के साथ अपने समय में वे लोकप्रियता की हद तक पहुंचे ।
   दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर टाइमकीपर, फिर टाइपराइटर मशीन के सेल्समॅन रहने के अलावा चमड़े की फॅक्टरी में भी उन्होंने काम किया । जम्मू में जन्मे और कलकत्ता में रेडियो स्टेशन पर गाना गाते आर सी बोराल ने उनको न्यू थियेटर्स के लिये चुना । फिल्म ‘पूरन भगत’ —1932 में दो गानों ‘राधे रानी दे डारो ना…’ व ‘भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी…’ को गाने के लिये उन्हें 25 रुपये मिले पर उसके रेकॉर्डस् हज़ारों में बिके, तब ग्रामोफोन कंपनी को लगा कि सहगल के साथ यह अन्याय हुआ है तब रॉयल्टी के आधार पर उनसे गवाने की दरख़्वास्त रखी गयी । सहगल बहुत भोले थे, बोले –अगर मेरा गाना नहीं चला तो आपके पच्चीस रुपये भी डूब जाएंगे– यहाँ सहगल ने कंपनी से मौखिक करार किया और यहीं से रॉयल्टी की प्रथा भी शुरु हुई । 1940–1941 में न्यू थियेटर्स में आग लगी जिसमें उनकी शुरु की असफल फिल्में –मुहब्बत के आंसू ,ज़िन्दा लाश, सुबह का सितारा, जल गयीं ।
न्यू थियेटर्स की ‘चंडीदास’ लोकप्रियता की पहली सीढ़ी थी । बाद में भारी सफल फिल्म ‘देवदास’ से वे बतौर गायक–एक्टर इतने मशहूर हुए कि लोकचाहना के शिखर तक पहुंच गये ।’बालम आए बसो मोरे मन में…’ और ‘अब दिन बितत नाहीं, दुख के…’ जैसे श्री केदार शर्मा के लिखे गानों ने शरतचंद्र के एक नाकाम, निराश प्रेमी की छवि को अमर बना दिया । देवकी बोस के निर्देशन में इस पहली पूर्ण सामाजिक फिल्म से स्वर्गीय बिमल रॉय भी जुड़े थे । एक निरंतर चली आती असफल, दुखदायी प्यार की दास्तान को जिस तरह पेश किया गया था उससे आहत हुए बिमल रॉय ने बाद में 1955 में अपने निर्देशन में ‘देवदास’ बनाकर इसी वेदना को दोहराया ।’प्रसीडेंट’, ‘दुश्मन’, ‘ज़िंदगी’, ‘स्ट्रीट सींगर’, ‘सूरदास’, ‘मेरी बहन’ ऐसी फिल्में हैं जो उन्हों ने अपने फिल्म जीवन के मध्यान्ह के समय कीं, और ज़ाहिर है, इन फिल्मों के गानों की गूंज न सिर्फ उस समय परंतु आज भी और आने वाले सालों तक सुनी जाएगी । बंबई में, उनकी बाद की फिल्में रणजीत की ‘तानसेन’, और ‘भँवरा’, कारदार की ‘शाहजहाँ’ थी ।’तदबीर’ और ‘परवाना’ में उस समय की उभरती गायिका–अदाकारा सुरैया के साथ नायक बने ।’शाहजहाँ’ व ‘परवाना’ उनकी अंतिम फिल्में थीं ।’ऐ दिले बेकरार झूम…’, ‘जन्नत ये बनायी है मोहब्बत के सहारे…’ —शाहजहाँ और ‘मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पाई जाती है…’, ‘कहीं उलझ न जाना…’ —परवाना फिल्मों के यह गाने गा कर उन्हों ने साबित कर दिया कि उनकी न्यू थियेटर्स की शुरु की गायकी —1933–34— और आख़िरी —1947— की गायकी की उत्तमता में कोई फ़र्क नहीं आया था ।
जितनी सहजता से वे अपनी मातृभाषा पंजाबी में गाते थे उतनी ही मीठास से वे बंगला गाने गाते थे ।पंजाबी एक या दो जब कि बंगला के कई गाने उनके उपलब्ध हैं ।हिंदी में उन्हों ने कृष्ण भजन बहुतेरे गाये हैं —भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी, —राधे रानी दे डारो ना, —सुनो सुनो हे कृष्ण काला, फिल्म ‘सूरदास’ व ‘चंडीदास’ आदि के भजन भी कृष्ण भजन में शामिल हैं, पर उनका कोई राम भजन जेहन में नहीं आ रहा है ।
यह सत्य भी सभी जानते हैं कि हमारे सभी नामी गायक जैसे मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार किस तरह अपने शुरूआती दौर में कुंदन लाल सहगल की नकल किया करते थे, इस बात का ज़िक्र उन्हों ने ख़ुद हमेशा किया है । लता जी ने कुंदन लाल सहगल  के ‘सो जा राजकुमारी…’ को कॅसेट में भी गाया है । मुकेश का ‘दिल जलता है तो जलने दे…’ पहली नज़र व किशोर कुमार का ‘मरने की दुआएं क्यूँ मांगू…’ —ज़िददी— दोनों गीत इस बात की मिसाल हैं कि कुंदन लाल सहगल  की तान उन पर किस कदर हावी थी । किशोर कुमार इस कदर सहगल के दीवाने थे कि वे अपने घर में निरंतर, लगातार ज़िंदगी के आख़िर दिनों तक उनके गाने सुना करते थे,यह बात उनकी पत्नी लीना चंदावरकार ने बतायी । सुना है कि महान कालाकार प्रेमनाथ भी हर समय, फिल्म शूटिंग के दौरान भी, कुंदन लाल सहगल  के गानों की कसॅट सुन करते थे ।पिछली पीढ़ी के अदाकार जो कि एक गहरी साहित्यिक और भाषाई —हिंदी, उर्दू —की समझ, ज्ञान रखते थे, सहगल की गायकी के कायल रहे हैं जिनमें कला के महान स्तंभ अशोक कुमार, प्राण, राज खोसला जैसे अनगिनत नाम हैं । सहगल के लहज़े की नकल उस दौर के व बाद के हर गायक ने कहीं न कहीं की । सहगल के गैर फिल्मी गीतों–ग़ज़लों की गायकी परंपरा को सी एच आत्मा, तलत मेहमूद, जगमोहन जैसे कलाकारों ने आगे बढ़ाया ।
नौशाद ने कुंदन लाल सहगल की मृत्यु के बाद जालंधर में मनायी गयी उनकी बरसी पर लिखा था —संगीत के माहिर तो बहुत आए हैं लेकिन दुनिया में कोई दूसरा ‘सहगल’ नहीं आया ।