Sunday, 31 March 2019

आनंद बख्शी

Friday, 29 March 2019

उत्पल दत्त

Wednesday, 13 March 2019

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे
शफी इनामदार का नाम सामने आते ही  ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार का नाम सामने आता है जो रंगमंच की दुनिया से आया बेजोड़ अदाकार था। चरित्र अभिनेताओं की कतार में उनका नाम हमेशा आदरपूर्वक लिया जाता है। टीवी फिल्में और नाटकों की बात करे तो शफी इनामदार का नाम सफल नाटकों के मंचन में सबसे पहले लिया जाएगा। वैसे उनकी प्रतिभा पानी की तरह थीं जिसमें में उपयोग करे वैसी बन जाती थीं। कोई भी पात्र विशष हो शफी को भूमिका सौंप देने का मतलब चादर पहनकर सो जाना था। कुछ कलाकार ऐसे होते है जिनकी उपस्थिति का ऐसा दर्शकों के विशाल वर्ग से नहीं बल्कि उनके किए काम से होता है। ऐसे कलाकारों की तुलना महानगर में बने हाई-वे से की जा सकती है जिसमें चलने पर खुषी तो मिलती पर हाई-वे जुडने वाली पगडंडी पर चलने की संतुष्टि का अपना एक अलग मजा है।शफी इनामदार अभिनय की सशक्त पगडंडी थे। 
मुंबई में पले बढ़े शफी इनामदार कॉलेज के दिनों से ही नाटकों से जुड़ गए थे। हिन्दी, गुजराती और मराठी तीनों रंगमंच पर  की तूती बोला करती थीं। उनके योगदान को रंगमंचीय परिप्रेक्ष्य में भुलाना नामुमुकन है। कालेज की पढ़ाई के बाद शफी इनामदार, कादर खान और प्रवीण जोशी के साथ जुड़ गए। उन्होंने नीला कमरा, अदा, अपन तो भाई ऐसे नाटकों में खूब नाम कमाया। शफी इनामदार बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे अभिनेता होने के साथ साथ नाट्यकार, निर्देशक, निर्माता, कॉमेडियन और चरित्र अभिनेता थे। सफल होने के बाद शफी ने अपना नाट्य ग्रुप हम बनाया और फिर उन्होंने तमाम हिन्दी नाटकों का निर्माण, निर्देशन न और अभिनय भी किया. उनका सबसे ज्यादा मशहूर  नाटक है बॉ रिटायर थई छे (मां रिटायर हो रही हेै) इस नाटक के हिन्दी गुजराती और मराठी में 500 से ज्यादा शो हुए है। उनके अन्य पापुलर नाटकों में डाक्टर तमे पन, शबाना द सैकंड और टोखर का नाम शामिल है शफी इनामदार को सेल्युलायड के परदे पर लाने का श्रेय गोविन्द निहलानी को तो छोटे परदे पर लाने कार्य मंजुला सिन्हा को जाता है। गोविंद निहलानी ने शफी इनामदार को विजेता में काम दिया। टीवी की बात करें तो शफी का हास्य धारावाहिक ये जो है जिदंगी भला कौंन भूल सकता है? इसमें रंजीत बने शफी इनामदार और रेणु बनीं स्वरुप संपत की जोड़ी ने नया इतिहास बनाया था। इस समय दूरदर्शन घुटनों के बल चल रहा था इस धारावाहिक की लोकप्रियता ने टीवी का नाम घर घर में लोकप्रिय कर दिया। सोप आपेरा शब्द की शुरुआत इसी धारावाहिक से हुई थीं।  एक भुल्लकड़ पति के रुप में शफी इनामदार ने बेमिसाल अभिनय किया था।  52 एपीसोड के बाद शफी ने जब इस धारावाहिक को छोड़ा तो फिर वह क्रेज नहीं रह पाया था इस धारावाहिक का। शफी इनामदार ने आल द बेस्ट तेरी भी चुप मेरी भी चुप फिलिप्स टाप-10,खट्टा-मीठा आदि धारावाहिको में काम किया था जहां तक फिल्मों की बात है तो शफी ने हर प्रकार की भूमिका निभाई। अर्धसत्य, आज की आवाज, मृत्युदाता, घायल, हिप हिप हुर्रे, यशवंत आदि फिल्में एक लाईन में याद आती हैं। शफी ने अपने निर्देशन में हम दोनों फिल्म का निर्माण भी किया था।  इसमें नाना पाटेकर और रिशी कपूर की जोड़ी थीं. शफी इनामदार का दशक वर्ग भले बहुत बड़ा न रहा हो, पर यह सच है कि मनोरंजन के कई क्षेत्रों में सक्रिय शफी एक मिसाल तो कायल कर ही गए हैं अभिनेता बनने से पहले वे बहुत बढिया इंसान थे। उनके साथ काम कर चुके कलाकार मानते है कि शफी इनामदार प्रेरक व्यक्तित्व के धनी थे। वे हमेशा बेहतर करने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने कभी भी अपनी भूमिका को लोकर नखरे बाजी नहीं की। वे सीधे सादे इंसान थे। यही उनकी खूबी थीं। शफी इनामदार ने अभिनेत्री भक्ति बर्वे से शादी की थी । शफी इनामदार की मृत्यु 13 मार्च 1996 को हुई थी । उनकी पत्नी का 12 फरवरी 2001 को सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था।

Saturday, 9 March 2019

दर्जी थे के. आसिफ


दर्जी थे के. आसिफ


के. आसिफ निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक थे, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की सर्वकालिक क्लासिक फिल्म मुगल ए आज़म बनाई थी। बहुत कम फिल्में और बहुत ज्यादा प्रसिद्धि हासिल करने वाले फिल्मकारों में के. आसिफ का नाम शायद अकेला है। भारतीय फिल्म जगत के इस महान फिल्मकार का पूरा नाम करीम आसिफ था।
करीम आसिफ का जन्म 14 जून 1922 कोे इटावा में  हुआ था। पिता का नाम डॉ. फजल करीम और माँ का नाम बीबी गुलाम फातिमा था। के. आसिफ ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। खुद उन्होंने भी कभी शिक्षित होने का दावा नहीं किया। बावजूद इसके वे महान फिल्मकार बने और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी एक अलग पहचान और जगह कायम की।  मामूली कपड़े सिलने वाले दर्जी के रूप में उन्होंने अपना कॅरियर शुरू किया था। बाद में लगन और मेहनत से निर्माता-निर्देशक बन गए। अपने तीस साल के लम्बे  कॅरियर में के आसिफ ने सिर्फ तीन मुकम्मल फिल्में बनाई- फूल (1945), हलचल (1951) और मुगल-ए-आजम (1960)। ये तीनों ही बड़ी फिल्में थीं और तीनों में सितारे भी बड़े थे। फूल जहां अपने युग की सबसे बड़ी फिल्म थी, वहीं हलचल ने भी अपने समय में काफी हलचल मचाई थी और मुगल ए-आजम तो हिंदी फिल्म जगत इतिहास का शिलालेख है। मोहब्बत को के.आसिफ कायनात की सबसे बड़ी दौलत मानते थे। इसी विचार को कैनवास पर लाते, अगर वे चित्रकार होते। इसी विचार को पर्दे पर लाने के लिए उन्होंने मुगल-ए-आजम का निर्माण किया। निर्देशक फूल (1945) मुगल-ए-आजम (1960) लव एण्ड गॉड (1986) (अधूरी) निर्माता हलचल (1951) मुगल-ए-आजम (1960) वे यह जानते हुए भी कि इसी विषय पर अनारकली जैसी फिल्म बन चुकी है, के. आसिफ रत्तीभर भी विचलित नहीं हुए। उनका आत्म-विश्वास इस फिल्म के बारे में कितना जबरदस्त था, यह बाद में फिल्म ने साबित करके दिखा दिया। भव्य सैट, नाम कलाकर और मधुर संगीत की त्रिवेणी मुगल ए आजम की सफलता के राज हैं। शकील बदायूँनी ने इस फिल्म में 12 गीत लिखे। नौशाद के संगीत में नहाकर बड़े गुलाम अली खां, लता मंगेशकर, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी की आवाज का जादू फिल्म के प्राण हैं। पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला के फिल्मी जीवन की यह सर्वोत्तम कृति है। महान फिल्मों की श्रेणी में मुगल-ए-आजम वाकई महान है।
मुगल-ए-आजम के बाद के. आसिफ ने लव एण्ड गॉड  भव्य फिल्म की शुरूआत की।  के. आसिफ कोई बड़े धार्मिक व्यक्ति नहीं थे, मगर मोहब्बत और खुदा में वे लैला-मजनूं की पुरानी भावना-प्रधान प्रेम कहानी के द्वारा दुनिया को कुछ ऐसा ही आनंद प्रदान करने वाला दर्शन देना चाहते थे। इस फिल्म को अपने जीवन का महान स्वप्न बनाने के लिए उन्होंने बहुत पापड़ भी बेले, मगर फिल्म के नायक गुरुदत्त की असमय मौत के कारण फिल्म रुक गई। फिर उन्होंने बड़े सितारों को लेकर एक और बड़ी फिल्म सस्ता खून महंगा पानी शुरू की। किन्हीं कारणों वश बाद में यह फिल्म भी बंद हो गई। तत्पश्चात उन्होंने लव एण्ड गॉड फिर से शुरू की, जिसमें गुरुदत्त की जगह संजीव कुमार को लिया गया। इससे पहले कि के. आसिफ यह फिल्म पूरी कर पाते 9 मार्च 1971 को दिल का दौरा पड़ने से उनका दुखद निधन हो गया। लव एण्ड गॉड को आसिफ जितना बना गए थे, उसे उसी रूप में उनकी पत्नी श्रीमती अख्तर आसिफ (दिलीप कुमार की बहन) ने निर्माता-निर्देशक केसी बोकाडिया के सहयोग से 1986 में प्रदर्शित किया। 
अधूरी लव एण्ड गॉड देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि के. आसिफ इस फिल्म को कैसा रूप देना चाहते थे। अगर यह फिल्म उनके हाथों से पूर्ण हो जाती, तो निश्चित ही वह भी एक यादगार फिल्म बन जाती। के. आसिफ को फिल्म कला से सामान्य रूप में और अपनी फिल्म से विशेष रूप से ऐसा लगाव था, जैसे लगन में पूजा जैसी पवित्रता और जुनून की सीमाओं तक बढ़ती हुई एकाग्रता थी। अपनी इन्हीं खूबियों की बदौलत वे मूवी-मुगल के नाम से मशहूर हुए। कई लोग उन्हें भारतीय फिल्म जगत के सिसिल बी. डिमिल भी कहते हैं। के. आसिफ की  विशेषता यह भी थी कि वे  फिल्म के निर्माण में वर्षों लगा देते थे। कई बार आधी से अधिक फिल्म बनाकर उसे रद्द कर देना और फिर से शूटिंग करना उनकी आदत में शुमार था। जिस शान-ओ-शौकत से वे फिल्में बनाते थे और जिस शाही अंदाज में खर्च करते थे, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। 

Thursday, 7 March 2019

अनुपम खेर

अनुपम खेर का जन्म 7 मार्च 1955 को शिमला में हुआ था। अनुपम खेर शिमला के डी.ए.वी. स्कूल से पढ़ें हुए हैं। अनुपम खेर की पहली शादी मधुमालती से हुई थी । उनसे तलाक के बाद उन्‍होंने किरन खेर से शादी कर ली । उनका बेटा एक्टर सिकंदर खैर है। उन्होंने करीब 500 फिल्मों में काम किया है. अनुपम खेर करीब 39 वर्षों से बॉलीवुड में अपना योगदान देते आयें हैं।  उन्होंने ने 1982 में फिल्म ‘आगमन’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया लेकिन उन्हें असली पहचान मिली 1984 में फिल्म ‘सारांश’ से जिसमें 28 साल के अनुपम खेर ने मिडिल क्लास रिटायर बूढ़े शख्स का किरदार निभाया था जो अपने बेटे को खो देता है। उनकी ये फिल्म यादगार बन गई और फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया. उन्‍होंने कई छोटी-बड़ी फिल्‍मों में काम कियाा खलनायक के रूप में फिल्‍म ‘कर्मा’ में उनके द्वारा निभाया गया किरदार ‘डॉ डैंग’ आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैा उन्‍होनें फिल्‍मों में लगभग हर तरह के किरदार निभाएहैं.उन्‍हें फिल्‍म ‘डैडी’ और ‘मैंने गांधी को न‍हीं मारा’ के लिए राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार भी मिल चुका हैा इसके अलावा भी उन्‍हें कई बार कई अवार्ड्स से सम्‍मानित किया जा चुका हैा अनुपम खेर हॉलीवुड की भी शानदार फिल्मों में नजर आ चुके हैं, जिसमें गोल्डन ग्लोब नॉमिनेटेड ‘बेंड इट लाइक बेकहम’, गोल्डन लॉयन विजेता ‘लस्ट कॉशन’ और ऑस्कर अवॉर्ड विजेता ‘सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक’ शामिल हैं. वे सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के चेयरमैन पद पर भी रह चुके हैं. सांसद और एक्टर किरण खेर अनुपम खेर की पत्नी हैं. 2004 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था और 2016 में उन्हें पद्मभूषण मिला।