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दीप्ति नवल का नाम उन अभिनेत्रियों में शुमार है जिन्होंने लीक से हटकर फिल्में की और अलग पहचान बनाई। उन्होंने जिंदगी से जुड़े किरदार निभाए और शायद इसीलिए दर्शकों को भी उनकी ये अदा भा गई। अपने लंबे करियर में दीप्ति नवल ने दर्जनों ऐसी फिल्में कीं जो हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुईं।
दीप्ति नवल का करियर बेहद अच्छा चल रहा था। एक तरफ जहां वो हर निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गईं थीं वहीं दूसरी ओर उनकी निजी जिंदगी में कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। कह सकते हैं कि सफलता के चरम पर पहुंचकर भी दीप्ति नवल की निजी जिंदगी में वीरानी ही रही। निर्देशक प्रकाश झा से उन्होंने शादी तो की, लेकिन 17 साल के बाद उनकी ये शादी टूट गई और दोनों का तलाक हो गया। तलाक के बाद दीप्ति की जिंदगी में अकेलापन छा गया था। हालांकि उनकी एक गोद ली हुई बेटी भी थी लेकिन अंदर से एक हमसफर की जो कमी खल रही थी वो दीप्ति नवल पर हावी हो रही थी, लेकिन जल्द ही उनकी जिंदगी में प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के बेटे विनोद पंडित आए। दीप्ति अब बेहद खुश थीं, ये सोचकर कि अब फिर से सबकुछ अच्छा होने वाला है। देखते ही देखते दीप्ति नवल और विनोद पंडित की सगाई भी हो गई और शादी की तारीखें निश्चित करने का सिलसिला शुरू हो गया। किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। एक तरफ दीप्ति और अशोक की शादी तय हुई वहीं दूसरी ओर शादी से पहले ही विनोद पंडित चल बसे। वो कैंसर के मरीज थे। विनोद पंडित के गुजर जाने के बाद दीप्ति नवल की जिंदगी में जैसे फिर से अंधेरा छा गया। प्यार में दो-दो बार हार मिलने से दीप्ति टूट सी गईं थीं।
दीप्ति नवल का करियर बेहद अच्छा चल रहा था। एक तरफ जहां वो हर निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गईं थीं वहीं दूसरी ओर उनकी निजी जिंदगी में कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। कह सकते हैं कि सफलता के चरम पर पहुंचकर भी दीप्ति नवल की निजी जिंदगी में वीरानी ही रही। निर्देशक प्रकाश झा से उन्होंने शादी तो की, लेकिन 17 साल के बाद उनकी ये शादी टूट गई और दोनों का तलाक हो गया। तलाक के बाद दीप्ति की जिंदगी में अकेलापन छा गया था। हालांकि उनकी एक गोद ली हुई बेटी भी थी लेकिन अंदर से एक हमसफर की जो कमी खल रही थी वो दीप्ति नवल पर हावी हो रही थी, लेकिन जल्द ही उनकी जिंदगी में प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के बेटे विनोद पंडित आए। दीप्ति अब बेहद खुश थीं, ये सोचकर कि अब फिर से सबकुछ अच्छा होने वाला है। देखते ही देखते दीप्ति नवल और विनोद पंडित की सगाई भी हो गई और शादी की तारीखें निश्चित करने का सिलसिला शुरू हो गया। किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। एक तरफ दीप्ति और अशोक की शादी तय हुई वहीं दूसरी ओर शादी से पहले ही विनोद पंडित चल बसे। वो कैंसर के मरीज थे। विनोद पंडित के गुजर जाने के बाद दीप्ति नवल की जिंदगी में जैसे फिर से अंधेरा छा गया। प्यार में दो-दो बार हार मिलने से दीप्ति टूट सी गईं थीं।
उन्होंने खुद को संभाला और मन लगाने के लिए फिर से एक्टिंग की तरफ रुख कर लिया। दीप्ति ने विनोद पंडित की मौत के बाद फिर से शादी नहीं की और फिल्मों को ही अपनी जिंदगी बना लिया। फिल्म इंडस्ट्री में दीप्ति नवल को तीन दशक से भी ज्यादा हो गए हैं, लेकिन 66 साल की इस उम्र में भी वो वैसे ही फिल्में कर रही हैं जैसे शुरुआती दिनों में करती थीं।
अमृतसर मे 3 फरवरी 1952 को जन्मीं दीप्ति नवल का बचपन अमरीका के न्यूयार्क में बीता जहां उनके पिता सिटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक थे। दीप्ति नवल बचपन से ही पेंटिंग एवं फोटोग्राफी के शौक होने से उन्होंने न्यूयॉर्क की सिटी यूनिवर्सिटी से शिक्षा के बाद मैनहट्टन के हंटर कॉलेज से फाइन आर्ट में बैचलर डिग्री हासिल की। न्यूयॉर्क में कॉलेज की पढ़ाई के बाद उन्होंने वहां रेडियो स्टेशन में काम करना शुरू कर दिया, जिस पर हिन्दी कार्यक्रम भी आते थे। साथ ही उन्होंने मैनहट्टन के ‘जीन फ्रैंकल एक्टिंग एंड फिल्म मेकिंग कोर्स’ में दाखिला ले लिया। कोर्स शुरू करने के एक महीने बाद ही उन्हें भारत आने का मौका मिला और इसी दौरान उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत 1977 में फिल्म ‘जलिया वाला बाग’ से हुई। इसके बाद उन्होंने निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म फिल्म ‘जूनुन’ की लेकिन उन्हें लोकप्रियता 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘एक बार फिर’ से मिली। अपने चार दशक लंबे करियर में दीप्ति नवल ने लीक से हटकर फिल्में की और एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने जिन्दगी से जुड़े किरदार निभाए और इसीलिए दर्शकों को उनकी अदाकारी भा गई। जिन फिल्मों के लिए वह जानी जाती हैं उनमें ‘एक बार फिर’, ‘अनकही’, ‘बवंडर, ‘लीला, ‘अंगूर’, ‘मिर्च मसाला’, ‘फिराक’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘कथा’ और ‘साथ-साथ’ जैसी कई फिल्में शामिल हैं। उन्होंने न केवल रूपहले पर्दे पर अभिनय की छाप छोड़कर एक उम्दा कलाकार के तौर पर अपने हुनर को साबित किया, बल्कि अपने मन के विचारों को खूबसूरती से कागज पर अल्फाजों के रूप में भी उतारा। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में कविता संकलन ‘लम्हा-लम्हा’ और ‘ब्लैक विंड एंड अदर पोयम्स’ तथा लघु कथा संग्रह ‘द मैड तिब्बन स्टोरीज फ्रॉम देन एंड नाउ’ बहुत प्रसिद्ध है। बहुआयामी व्यक्तित्व की मालकिन दीप्ति कवयित्री होने के साथ-साथ फोटाग्राफी के शौक के चलते अपने कैमरे से खींची तस्वीरों से और उम्दा पेंटिंग्स बनाकर भी अपने कलाकार मन का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्मों में केवल अभिनय ही नहीं, किया बल्कि लेखन, निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाया और इसी क्रम में महिलाओं पर आधारित एक टीवी धारावाहिक ‘थोड़ा सा आसमान’ का लेखन और निर्देशन किया व एक यात्रा शो ‘द पाथ लेस ट्रैवल्ड’ का निर्माण भी किया। उन्हें संगीत से भी काफी लगाव है और वे खुद भी कई वाद्य यंत्र बजा लेती हैं। इसके अलावा हिमाचल और लद्दाख की पहाड़ियों में ट्रैकिंग भी दीप्ति के शौक में शुमार हैं। अपने अब तक के फिल्मी करियर में 70 से ज्यादा फिल्में करने वाली दीप्ति 2014 में रिलीज हुई फिल्म ‘यारियां’ में गर्ल्स होस्टल वार्डन की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म से पहले वह साल 2013 में ‘बीए पास’ और ‘औरंगजेब’ में भी नजर आ चुकी हैं, जबकि उन्होंने एनिमेटेड फिल्म ‘महाभारत 3D’ में कुन्ती के कैरेक्टर को अपनी आवाज दी है।
अमृतसर मे 3 फरवरी 1952 को जन्मीं दीप्ति नवल का बचपन अमरीका के न्यूयार्क में बीता जहां उनके पिता सिटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक थे। दीप्ति नवल बचपन से ही पेंटिंग एवं फोटोग्राफी के शौक होने से उन्होंने न्यूयॉर्क की सिटी यूनिवर्सिटी से शिक्षा के बाद मैनहट्टन के हंटर कॉलेज से फाइन आर्ट में बैचलर डिग्री हासिल की। न्यूयॉर्क में कॉलेज की पढ़ाई के बाद उन्होंने वहां रेडियो स्टेशन में काम करना शुरू कर दिया, जिस पर हिन्दी कार्यक्रम भी आते थे। साथ ही उन्होंने मैनहट्टन के ‘जीन फ्रैंकल एक्टिंग एंड फिल्म मेकिंग कोर्स’ में दाखिला ले लिया। कोर्स शुरू करने के एक महीने बाद ही उन्हें भारत आने का मौका मिला और इसी दौरान उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत 1977 में फिल्म ‘जलिया वाला बाग’ से हुई। इसके बाद उन्होंने निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म फिल्म ‘जूनुन’ की लेकिन उन्हें लोकप्रियता 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘एक बार फिर’ से मिली। अपने चार दशक लंबे करियर में दीप्ति नवल ने लीक से हटकर फिल्में की और एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने जिन्दगी से जुड़े किरदार निभाए और इसीलिए दर्शकों को उनकी अदाकारी भा गई। जिन फिल्मों के लिए वह जानी जाती हैं उनमें ‘एक बार फिर’, ‘अनकही’, ‘बवंडर, ‘लीला, ‘अंगूर’, ‘मिर्च मसाला’, ‘फिराक’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘कथा’ और ‘साथ-साथ’ जैसी कई फिल्में शामिल हैं। उन्होंने न केवल रूपहले पर्दे पर अभिनय की छाप छोड़कर एक उम्दा कलाकार के तौर पर अपने हुनर को साबित किया, बल्कि अपने मन के विचारों को खूबसूरती से कागज पर अल्फाजों के रूप में भी उतारा। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में कविता संकलन ‘लम्हा-लम्हा’ और ‘ब्लैक विंड एंड अदर पोयम्स’ तथा लघु कथा संग्रह ‘द मैड तिब्बन स्टोरीज फ्रॉम देन एंड नाउ’ बहुत प्रसिद्ध है। बहुआयामी व्यक्तित्व की मालकिन दीप्ति कवयित्री होने के साथ-साथ फोटाग्राफी के शौक के चलते अपने कैमरे से खींची तस्वीरों से और उम्दा पेंटिंग्स बनाकर भी अपने कलाकार मन का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्मों में केवल अभिनय ही नहीं, किया बल्कि लेखन, निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाया और इसी क्रम में महिलाओं पर आधारित एक टीवी धारावाहिक ‘थोड़ा सा आसमान’ का लेखन और निर्देशन किया व एक यात्रा शो ‘द पाथ लेस ट्रैवल्ड’ का निर्माण भी किया। उन्हें संगीत से भी काफी लगाव है और वे खुद भी कई वाद्य यंत्र बजा लेती हैं। इसके अलावा हिमाचल और लद्दाख की पहाड़ियों में ट्रैकिंग भी दीप्ति के शौक में शुमार हैं। अपने अब तक के फिल्मी करियर में 70 से ज्यादा फिल्में करने वाली दीप्ति 2014 में रिलीज हुई फिल्म ‘यारियां’ में गर्ल्स होस्टल वार्डन की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म से पहले वह साल 2013 में ‘बीए पास’ और ‘औरंगजेब’ में भी नजर आ चुकी हैं, जबकि उन्होंने एनिमेटेड फिल्म ‘महाभारत 3D’ में कुन्ती के कैरेक्टर को अपनी आवाज दी है।
दीप्ति कला के अलावा मानसिक रूप से बीमार लोगों के बारे में जागरूकता फैलाने के काम में भी लगी हैं और साथ ही वह लड़कियों की शिक्षा के लिए अपने दिवंगत मंगेतर विनोद पंडित की याद में स्थापित ‘विनोद पंडित चैरिटेबल ट्रस्ट’ भी चलाती हैं।
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