Thursday, 25 March 2021

This Lata Mangeshkar song is from Shatranj (1956) with Ashok Kumar and Meena Kumari in lead roles. Music is by C Ramachandra (CR) and lyrics by Rajinder Krishan. The film also had Nanda (one of the early films for Nanda). This song appears in the film twice, both in happy moods. But the mood of Ashok KUmar is different- happy in first, sad in the second. 

Both versions of this Do Pehlu Do Rang Do Geet song have playback by Lata.




हवा है सर्द सर्द और दिल में भी है दर्द
बरसी है कहीं आज घटा

मौसम का रंग है अजीब, बुल्बुल से फूल है करीब
आये बहार के कदम, जाग है बाग का नसीब
सुनके घटा का शोर, जंगल में नाचा मोर
बरसी है कहीं आज घटा

शाकें सवर सवर गयी, कलियां निखर निखर गयी
देखा समा झुला झुला, नज़रे जिधर जिधर गयी
कैसा अजब है रंग, भीगा है अंग अंग
बरसी है कहीं आज घटा

हवा है सर्द सर्द...
—
हवा है सर्द सर्द और दिल में भी है दर्द
बरसी है कहीं आज घटा

मौसम का रंग है अजीब,बुल्बुल से फूल है करीब
आये बहार के कदम,जागा है बाग का नसीब
सुनके घटा का शोर, जंगल में नाचा मोर
बरसी है कहीं आज घटा

ठण्डी हवा के साथ साथ, दिल में ये आ रही है बात
जाऊँ यहां से दूर दूर, हातों में लेके उनक हाथ
मचला हुआ है दिल, ऐसे में आके मिल
बरसी है कहीं आज घटा

हवा है सर्द सर्द...

 

Aaj Duniya Badi Suhanee Hai, Aisi Rangeen


A very nice song by Asha Bhosle from Nartaki (1963). Music is by Ravi and lyrics by Shakeel Badayuni.


The film was a social drama, where Nanda plays the role of a dancing girl, trying to improve her life with education. She is helped by a professor, played by Sunil Dutt. The film also has Zeb Rehman, who gets to lip sync this song, in front of piano.

Music is by Ravi and lyrics are by Shakeel Badayuni.




आज दुनिया बड़ी सुहानी है -२
कैसी रंगीन ज़िन्दगानी है -२
आज दुनिया बड़ी ...

जाने क्यूँ आज दिल में रह-रह कर मीठे-मीठे ख़्याल आते हैं
जाने क्यूँ आज मेरे होंठों पर कुछ अधूरे सवाल आते हैं
ये हक़ीक़त है या कहानी है -२
आज दुनिया बड़ी ...

यूँ नज़र आ रहा है जैसे कोई आज मेरे क़रीब आता हो
और दिल की हसीन राहों में ज़िन्दगी के दिए जलाता हो
जाने किसकी ये मेहरबानी है -२
आज दुनिया बड़ी ...

 A nice romantic duet featuring Dharmendra and Mala Sinha from the film Pooja Ke Phool (1964). Playback is by Mohammad Rafi and Asha Bhosle.  Music is by Madan Mohan and lyrics are by Rajinder Krishan. The film also had Ashok Kumar and Nimmi.



The song is picturised at Vrindavan Gardens, Mysore. Since this is a black and white film, the beauty of the gardens is not seen. Several songs have been filmed at this location.  




र : अब दो दिलों की मुश्किल आसान हो गई है
दुनिया को मोहब्बत की पहचान हो गई है
ल : अब प्यार की हर मंज़िल आसान हो गई है
आपस में दो दिलों की पहचान हो गई है

र : इस रास्ते से गुज़रा इक दिन कोई बेचारा
ना जाने किस अदा से तुमने उसे पुकारा
ऐसा किया इशारा कुछ सोच के बेचारा
वो हो गया तुम्हारा
दुनिया भी देखकर ये हैरान हो गई है

ल : कब से तुम्हारी ख़ातिर हम राह में पड़े थे
इक रोज़ फिर ये देखा तुम सामने खड़े थे
ऐसी नज़र मिलाई दुनिया मुझे भुलाई
कुछ सोच भी न पाई
जैसे कि रूह मेरी बेजान हो गई है

र : मिलना था जिनको अब वो दीवाने मिल गए हैं
ल : तेरी दास्ताँ से मेरे अफ़साने मिल गए हैं
र : अब एक ही कहानी अब एक ही फ़साना
अब एक ही तराना
ल : दो जिस्म तो हैं लेकिन इक जान हो गई है

 Bhai Bhai (1956) was the film that was Madan Mohan's first hit. While he had already scored wonderful music in  Madhosh, Ashiana, Ada, Railway Platform .. but he had not received the recognition that he deserved. 


On screen we see Nimmi with another lady E Saroja  (dressed as a man). This song has playback by Asha Bhosle. Some sites list this as a Lata Mangeshkar song. 

Bhai Bhai was Hindi screen adaptation of the Tamil film Ratha Paasam and had Nimmi, Kishore Kumar, Ashok Kumar, Nirupa Roy and Shyama in lead roles.




दिल तेरी नज़र में
अटका रे अटका रे अटका
मुझे लगा बालम
तेरे प्यार में कैसा
झटका रे झट्का रे झटका
दिल तेरी नज़र में
अटका रे अटका रे अटका
मुझे लगा बालम
तेरे प्यार में कैसा
झटका रे झट्का रे झटका

सुनो मेरे रसिया
सुनो मेरे रसिया
ओ मन बसिया मिथि तेरी बोली
सुन सुन के तेरे बोल रसिले
मेरे मन की दुनिया डोली
साजन मेरे मन की दुनिया डोली
बालम मेरे मन की दुनिया डोली
मेरे मन का पंछी भटका
बलम जी भटका सजन जी भटका
मुझे लगा बालम
तेरे प्यार में कैसा
झटका रे झट्का रे झटका
दिल तेरी नज़र में
अटका रे अटका रे अटका
मुझे लगा बालम
तेरे प्यार में कैसा
झटका रे झट्का रे झटका

 Bhai Bhai (1956) was a film with Ashok Kumar, Nirupa Roy, Shyama, Kishore Kumar and Nimmi in lead roles. The film had music by Madan Mohan. 


This film indeed was the first commercial success of Madan Mohan. This is a Do Pehlu Do Rang Do Geet song, with a happy and a sad version, both by Lata mangeshkar.







मेरा छोटा सा देखो ये संसार है-२
मेरा जीवन है ये, मेरा सिंगार है
मेरा छोटा सा देखो.......

मेरी छोटी सी बगिया के ओ बाग़बाँ-२
तेरे दम से है सारी, बहारे यहाँ-२
सारे बाग़ोँ से अच्छा,ये गुल्ज़ार है
मेरा छोटा सा देखो......

मेरा जीवन है एक मूस्कुराहट तेरी-२
मेरी दुनिया है क़दमों कि आहट तेरी-२
तेरे क़दमों में ही मेरा घरबार है
मेरा छोटा सा देखो......

छोड के मैं तुझे, कोई जन्नत ना लूँ-२
तेरे बदले में दुनियां की, दौलत ना लूँ-२
मेरी पूजा पिया, तेरा दीदार है
मेरा छोटा सा देखो......

निम्मी

 निम्मी,हिन्दी फि़ल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में  रही हैं। उनका असली नाम ‘नवाब बानू था। बॉलीवुड की इस मासूम-सी ख़ूबसूरत अभिनेत्री का राज कपूर ने फि़ल्मी दुनिया से परिचय करवाया था। हालांकि निम्मी की फि़ल्मी शुरुआत सहायक अभिनेत्री के तौर पर राज कपूर और नर्गिस अभिनीत फि़ल्म ‘बरसात 1949 से हुई थी। दिलचस्प बात तो यह भी है कि इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री पर राज कपूर की नजऱ उस समय पड़ी, जब वे एक फि़ल्म की शूटिंग देख रही थीं। निम्मी अपनी समकालीन नायिकाओं मधुबाला, नर्गिस, नूतन, मीना कुमारी, सुरैया और गीता बाली के समान ही प्रतिभाशाली थीं। निम्मी ख़ूबसूरत आँखों वाली सम्मोहक अभिनेत्री मानी जाती हैं। फि़ल्म में उनकी भूमिका को कभी भी सहनायिका के रूप में नहीं लिया गया। उन पर बहुत-सी फि़ल्मों के यादगार गीत फि़ल्माए गए थे। निर्देशक के. आसिफ़ की फि़ल्म ‘लव एंड गॉड उनकी आखिरी फि़ल्म थी।

निम्मी कभी स्कूल नहीं गई थीं। इसलिए घर की पढ़ाई ने उन्हें उर्दू तक ही सीमित रखा। वैसे फि़ल्मों में काम करते समय उन्होंने अंग्रेज़ी जरूर सीखी थी, लेकिन वे बातचीत अपनी ही जुबान में करती थीं। एक दिन काम करते वक्त निम्मी की मुलाकात लेखक अली रजा से हुई। संवाद की रिहर्सल कराने के लिए अली रजा ने निम्मी की मदद की। बाद में अली रजा ने ही उनमें शायरी का शौक़ पैदा कर दिया। बाद में यह शायरी दोस्ती और प्यार में बदल गई तो निम्मी ने लेखक-पटकथाकार अली रजा से शादी कर ली।

1948 में प्रसिद्ध फि़ल्म निर्माता-निर्देशक महबूब ख़ान, सेंट्रल स्टूडियो बम्बई में अपनी फि़ल्म ‘अंदाज़ की शूटिंग कर रहे थे। ‘अंदाज़ में दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ थीं नर्गिस। इन तीनों ने पहली और आखिरी बार एक साथ काम किया था। निम्मी भी यहाँ मौजूद थीं। वह अक्सर शूटिंग देखने आती थीं। यहीं उन्हें राज कपूर ने देखा। उन दिनों राज कपूर फि़ल्म ‘बरसात 1949 के लिए एक नए चेहरा तलाश रहे थे। ‘अंदाज के सेट पर निम्मी का शर्मीला व्यवहार देखने के बाद ‘बरसात में अभिनेता प्रेमनाथ के साथ निम्मी को ले लिया गया। फि़ल्म ‘बरसात में निम्मी हृदयहीन शहरी प्रेम नाथ आदमी को प्यार करती है। निम्मी ने इस फि़ल्म में एक मासूम पहाड़ी गड़ेरिन की भूमिका निभाई थी।

बरसात फि़ल्म ने बॉक्स ऑफि़स पर इतिहास बनाया। ‘बरसात को अभूतपूर्व महत्त्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता मिली थी। स्थापित और लोकप्रिय सितारों नर्गिस, राज कपूर और प्रेमनाथ की मौजूदगी के बावजूद निम्मी ने अपना किरदार बखूबी निभाया था। फि़ल्म के लोकप्रिय शीर्षक गीत बरसात में हम से मिले तुम, जिया बेकऱार है, पतली कमर है सभी निम्मी पर फि़ल्माये गये थे। ‘बरसात में पहली बार हिन्दी फि़ल्मों में बलात्कार का सीन सामने आया और यह बलात्कार क्लासिक बन गया। फि़ल्म का चरमोत्कर्ष भी नवेली अभिनेत्री के इर्द-गिर्द घूमता रहा। ‘बरसात की भारी सफलता ने निम्मी को स्टार बना दिया।

हिंदी फिल्मों का पहला बलात्कार दृश्य “राजकपूर की बरसात में फिल्माया गया था. निम्मी पर -(फ़िल्मी बलात्कार को अंजाम दिया प्रेम नाथ ने।

हिंदी फिल्मों का दूसरा बलात्कार दृश्य अमर में था महबूब की इस फिल्म के हीरो थे दिलीप कुमार। उस दौर में यह दृश्य फिल्माना ही फ़िल्मकार के साहस का प्रतीक माना जाता था। फ़िल्मकार दर्शकों यह अंदाज़ा लगाने के लिए मजबूर कर देते की वो यह मान लें की बलात्कार हो गया है क्योंकि बलात्कार भी प्रतीकात्मक होते थे। कई फिल्मों में फिल्मकारों ने निम्मी से बलात्कार दृश्य की मांग रखी जिसे निम्मी ने ठुकरा दिया।

अभिनेत्री निम्मी को 1950 के दशक की महान अग्रणी महिलाओं में   माना जाता है। उनकी कुछ प्रमुख -फि़ल्में बरसात 1949 राज मुकुट, जलते दीप 1950 सज़ा 1951 दीदार 1951 बुज़दिल 1951 बेदर्दी 1951 बड़ी बहू 1951 उषा किरण 1952 दाग 1952 आँधियाँ 1952 आन 1952 हमदर्द 1953 लिफ़ लैला 1953 प्यासे नैन 1954 कस्तूरी 1954 डंका 1954 अमर 1954 उडऩ खटोला 1955 कुंदन 1955 भागवत महिमा 1955 राजधानी १956 भार्ई भाई 1956 बसंत बहार 1956 अंजलि 1957छोटे बाबू 1957 सोहनी महिवाल 1958 पहली रात 1959 चार दिल चार राहें 1959 अंगुलिमाल 1960 मेरे मेहबूब 1963 पूजा के फूल 1964 दाल में काला 1964 आकाशदीप 1965 लव एंड गॉड 1986 ।

Monday, 23 November 2020

नूरजहां

 आज़ादी से पहले भारतीय सिनेमा की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और पाश्र्व गायिकाओं में से एक थीं। उनका वास्तविक नाम अल्ला वसई था। दक्षिण एशिया की महानतम गायिकाओं में शुमार की जाने वाली मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ को लोकप्रिय संगीत में क्रांति लाने और पंजाबी लोकगीतों को नया आयाम देने का श्रेय जाता है। उनकी गायकी में वह जादू था कि हर उदयमान गायक की प्रेरणा स्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने करियर का आगाज किया तो उन पर नूरजहाँ की गायकी का प्रभाव था। नूरजहाँ अपनी आवाज में नित्य नए प्रयोग किया करती थीं। अपनी इन खूबियों की वजह से ही वे ठुमरी गायिकी की महारानी कहलाने लगी थीं।

नूरजहाँ का जन्म 21 सितम्बर, 1926 को ब्रिटिश भारत में पंजाब के कसूर नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मदद अली था और माता फतेह बीबी थीं। नूरजहाँ के पिता पेशेवर संगीतकार थे। माता-पिता की ग्यारह संतानों में से नूरजहाँ एक थीं।1, संगीतकारों के परिवार में जन्मी नूरजहाँ को बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहाँ ने पाँच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। वे किसी भी लोकगीत को सुनने के बाद उसे अच्छी तरह याद कर लिया करती थीं। इसको देखते हुए उनकी माँ ने उन्हें संगीत का प्रशिक्षण दिलाने का इंतजाम किया। उस दौरान उनकी बहन आइदान पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं। तत्कालीन समय में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफी माँग थी।

इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 193० के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार गुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फिल्म शीला उर्फ पिंड दी कुड़ी में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। 1935 में रिलीज हुई यह फिल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने पंजाबी फिल्म उद्योग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फिल्म के गीत बहुत हिट रहे। 1930 के दशक के उत्तरार्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए थे। गायकों की बढ़ती माँग को देखते हुए नूरजहाँ का परिवार 1937 में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहाँ को सुना और गुल-ए-बकवाली फिल्म में उन्हें भूमिका दी। यह फिल्म भी काफी हिट रही और गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उनकी यमला जट (1940), चौधरी फिल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने कचियाँ वे कलियाँ ना तोड़ और बस वे ढोलना कि तेरे नाल बोलना बहुत लोकप्रिय हुए।

1942 में नूरजहाँ ने अपने नाम से बेबी शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फिल्म खानदान आई, जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन रिजवी के साथ उन्होंने विवाह कर लिया।1, बाद के समय में नूरजहाँ ने अपने से दस वर्ष छोटे एजाज दुर्रान से विवाह किया। 1943 में नूरजहाँ मुम्बई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वे अपने सभी समकालीनों से काफी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फिल्मों लाल हवेली जीनत, बड़ी माँ, गाँव की गोरी और मिर्जा साहिबाँ फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। फिल्म अनमोल घड़ी का संगीत अपने समय के ख्याति प्राप्त संगीतकार नौशाद ने दिया था। उसके गीत आवाज दे कहाँ है, जवाँ है मोहब्बत और मेरे बचपन के साथी जैसे गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं। नूरजहाँ देश के विभाजन के बाद अपने पति शौकत हुसैन रिजवी के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं।

लाहौर में रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और वहाँ शाहनूर स्टूडियो की शुरुआत की। शाहनूर प्रोडक्शन ने फिल्म चन्न वे (1950) का निर्माण किया, जिसका निर्देशन नूरजहाँ ने किया। यह फिल्म बेहद सफल रही। इसमें तेरे मुखड़े पे काला तिल वे जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फिल्म दुपट्टा थी। इसके गीत चाँदनी रातें…चाँदनी रातें आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं। देश के विभाजन के बाद जहाँ एक तरफ . आर. कारदार और महबूब खान जैसे कलाकार यहीं रह गए, वहीं बहुत-से ऐसे कलाकार भी थे, जिन्हें पाकिस्तान चले जाना पड़ा था। नूरजहाँ भी इनमें से एक थीं। भारत छोड़ पाकस्तिान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने विविध भारती में बताया था कि- आपको ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफसा-नफसी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौकत हुसैन रिजवी है। उस वक्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वकत निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती? पाकिस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फिल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- जुगनू और मिर्जा साहिबाँ।

जुगनू शौकत हुसैन रिजवी की फिल्म थी शौकत आर्ट प्रोडक्शन्स के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फिरोज निजामी ने मोहम्मद रफी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फिल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था यहाँ बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है। इस गीत की अवधि कर्रीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी, जो उस जमाने के लिहाज से काफी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौकत हुसैन रिजवी ने खुद ही लिखा था, पर हमराज गीत कोश के अनुसार फिल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।

नूरजहाँ की प्रमुख फिल्में यमला जट1940 1941 रेड सिग्नल सुसराल खानदान1942 1943 नादान दुहाई 1944. लाल हवेली1945.गाँव की गोरीबड़ी माँ भाईजान1946. अनमोल घडी जादूगर1947 जुगनू 1951 चनवे 1952 दुपट्टा 1955 फतेह खान 1956 इंतजार, लख्ते-ए-जिगर 1958 अनारकली छूमंतर 1959 परदेशियाँ कोयल 1961मिर्जा गालिब 1961 अंतिम फिल्म।
बतौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फिल्म बाजी थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फिल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फिल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा।

पाकिस्तान में पाश्र्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फिल्म जान-ए-बहार (1958) थी। इस फिल्म का कैसा नसीब लाई गाना काफी लोकप्रिय हुआ। नूरजहाँ ने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फिल्मी कॅरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में कई गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान तमगा-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया गया था। अपनी दिलकश आवाज और अदाओं से दर्शकों को मदहोश कर देने वाली नूरजहाँ का दिल का दौरा पडऩे से 23 दिसम्बर, 2000 को निधन हुआ।

1996 में ही नूरजहाँ आवाज की दुनिया से जुदा हो गई थीं। 1996 में प्रदर्शित एक पंजाबी फिल्म सखी बादशाह में उन्होंने अपना अंतिम गाना गाया था। नूरजहाँ ने अपने संपूर्ण फिल्मी कॅरियर में लगभग एक हजार गाने गाए।

2000 में जब नूरजहाँ की मौत हुई, तो उनकी एक बुजुर्ग चाची ने कहा था- जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है। नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है। तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक खास शाम का आयोजन किया था। एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए। पीर ने उस लड़की से कहा- बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ। उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे। जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा- लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी। नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फरमाइश पर गाना सख्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताजिंदगी याद रखे। सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था। वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं। नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद गुलाम मोहम्मद उर्फ गम्मे खघँ को। जरा बाजा तो मँगवाना, उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बगल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा- नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन….. टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।

दुनिया के किसी भी कोने में मैडम शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, किंतु पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार खालिद हसन ने लिखा था दिल का दौरा तो उन्हें पडऩा ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उसके, और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी।