Thursday, 25 March 2021

 Bhai Bhai (1956) was a film with Ashok Kumar, Nirupa Roy, Shyama, Kishore Kumar and Nimmi in lead roles. The film had music by Madan Mohan. 


This film indeed was the first commercial success of Madan Mohan. This is a Do Pehlu Do Rang Do Geet song, with a happy and a sad version, both by Lata mangeshkar.







मेरा छोटा सा देखो ये संसार है-२
मेरा जीवन है ये, मेरा सिंगार है
मेरा छोटा सा देखो.......

मेरी छोटी सी बगिया के ओ बाग़बाँ-२
तेरे दम से है सारी, बहारे यहाँ-२
सारे बाग़ोँ से अच्छा,ये गुल्ज़ार है
मेरा छोटा सा देखो......

मेरा जीवन है एक मूस्कुराहट तेरी-२
मेरी दुनिया है क़दमों कि आहट तेरी-२
तेरे क़दमों में ही मेरा घरबार है
मेरा छोटा सा देखो......

छोड के मैं तुझे, कोई जन्नत ना लूँ-२
तेरे बदले में दुनियां की, दौलत ना लूँ-२
मेरी पूजा पिया, तेरा दीदार है
मेरा छोटा सा देखो......

निम्मी

 निम्मी,हिन्दी फि़ल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में  रही हैं। उनका असली नाम ‘नवाब बानू था। बॉलीवुड की इस मासूम-सी ख़ूबसूरत अभिनेत्री का राज कपूर ने फि़ल्मी दुनिया से परिचय करवाया था। हालांकि निम्मी की फि़ल्मी शुरुआत सहायक अभिनेत्री के तौर पर राज कपूर और नर्गिस अभिनीत फि़ल्म ‘बरसात 1949 से हुई थी। दिलचस्प बात तो यह भी है कि इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री पर राज कपूर की नजऱ उस समय पड़ी, जब वे एक फि़ल्म की शूटिंग देख रही थीं। निम्मी अपनी समकालीन नायिकाओं मधुबाला, नर्गिस, नूतन, मीना कुमारी, सुरैया और गीता बाली के समान ही प्रतिभाशाली थीं। निम्मी ख़ूबसूरत आँखों वाली सम्मोहक अभिनेत्री मानी जाती हैं। फि़ल्म में उनकी भूमिका को कभी भी सहनायिका के रूप में नहीं लिया गया। उन पर बहुत-सी फि़ल्मों के यादगार गीत फि़ल्माए गए थे। निर्देशक के. आसिफ़ की फि़ल्म ‘लव एंड गॉड उनकी आखिरी फि़ल्म थी।

निम्मी कभी स्कूल नहीं गई थीं। इसलिए घर की पढ़ाई ने उन्हें उर्दू तक ही सीमित रखा। वैसे फि़ल्मों में काम करते समय उन्होंने अंग्रेज़ी जरूर सीखी थी, लेकिन वे बातचीत अपनी ही जुबान में करती थीं। एक दिन काम करते वक्त निम्मी की मुलाकात लेखक अली रजा से हुई। संवाद की रिहर्सल कराने के लिए अली रजा ने निम्मी की मदद की। बाद में अली रजा ने ही उनमें शायरी का शौक़ पैदा कर दिया। बाद में यह शायरी दोस्ती और प्यार में बदल गई तो निम्मी ने लेखक-पटकथाकार अली रजा से शादी कर ली।

1948 में प्रसिद्ध फि़ल्म निर्माता-निर्देशक महबूब ख़ान, सेंट्रल स्टूडियो बम्बई में अपनी फि़ल्म ‘अंदाज़ की शूटिंग कर रहे थे। ‘अंदाज़ में दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ थीं नर्गिस। इन तीनों ने पहली और आखिरी बार एक साथ काम किया था। निम्मी भी यहाँ मौजूद थीं। वह अक्सर शूटिंग देखने आती थीं। यहीं उन्हें राज कपूर ने देखा। उन दिनों राज कपूर फि़ल्म ‘बरसात 1949 के लिए एक नए चेहरा तलाश रहे थे। ‘अंदाज के सेट पर निम्मी का शर्मीला व्यवहार देखने के बाद ‘बरसात में अभिनेता प्रेमनाथ के साथ निम्मी को ले लिया गया। फि़ल्म ‘बरसात में निम्मी हृदयहीन शहरी प्रेम नाथ आदमी को प्यार करती है। निम्मी ने इस फि़ल्म में एक मासूम पहाड़ी गड़ेरिन की भूमिका निभाई थी।

बरसात फि़ल्म ने बॉक्स ऑफि़स पर इतिहास बनाया। ‘बरसात को अभूतपूर्व महत्त्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता मिली थी। स्थापित और लोकप्रिय सितारों नर्गिस, राज कपूर और प्रेमनाथ की मौजूदगी के बावजूद निम्मी ने अपना किरदार बखूबी निभाया था। फि़ल्म के लोकप्रिय शीर्षक गीत बरसात में हम से मिले तुम, जिया बेकऱार है, पतली कमर है सभी निम्मी पर फि़ल्माये गये थे। ‘बरसात में पहली बार हिन्दी फि़ल्मों में बलात्कार का सीन सामने आया और यह बलात्कार क्लासिक बन गया। फि़ल्म का चरमोत्कर्ष भी नवेली अभिनेत्री के इर्द-गिर्द घूमता रहा। ‘बरसात की भारी सफलता ने निम्मी को स्टार बना दिया।

हिंदी फिल्मों का पहला बलात्कार दृश्य “राजकपूर की बरसात में फिल्माया गया था. निम्मी पर -(फ़िल्मी बलात्कार को अंजाम दिया प्रेम नाथ ने।

हिंदी फिल्मों का दूसरा बलात्कार दृश्य अमर में था महबूब की इस फिल्म के हीरो थे दिलीप कुमार। उस दौर में यह दृश्य फिल्माना ही फ़िल्मकार के साहस का प्रतीक माना जाता था। फ़िल्मकार दर्शकों यह अंदाज़ा लगाने के लिए मजबूर कर देते की वो यह मान लें की बलात्कार हो गया है क्योंकि बलात्कार भी प्रतीकात्मक होते थे। कई फिल्मों में फिल्मकारों ने निम्मी से बलात्कार दृश्य की मांग रखी जिसे निम्मी ने ठुकरा दिया।

अभिनेत्री निम्मी को 1950 के दशक की महान अग्रणी महिलाओं में   माना जाता है। उनकी कुछ प्रमुख -फि़ल्में बरसात 1949 राज मुकुट, जलते दीप 1950 सज़ा 1951 दीदार 1951 बुज़दिल 1951 बेदर्दी 1951 बड़ी बहू 1951 उषा किरण 1952 दाग 1952 आँधियाँ 1952 आन 1952 हमदर्द 1953 लिफ़ लैला 1953 प्यासे नैन 1954 कस्तूरी 1954 डंका 1954 अमर 1954 उडऩ खटोला 1955 कुंदन 1955 भागवत महिमा 1955 राजधानी १956 भार्ई भाई 1956 बसंत बहार 1956 अंजलि 1957छोटे बाबू 1957 सोहनी महिवाल 1958 पहली रात 1959 चार दिल चार राहें 1959 अंगुलिमाल 1960 मेरे मेहबूब 1963 पूजा के फूल 1964 दाल में काला 1964 आकाशदीप 1965 लव एंड गॉड 1986 ।

Monday, 23 November 2020

नूरजहां

 आज़ादी से पहले भारतीय सिनेमा की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और पाश्र्व गायिकाओं में से एक थीं। उनका वास्तविक नाम अल्ला वसई था। दक्षिण एशिया की महानतम गायिकाओं में शुमार की जाने वाली मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ को लोकप्रिय संगीत में क्रांति लाने और पंजाबी लोकगीतों को नया आयाम देने का श्रेय जाता है। उनकी गायकी में वह जादू था कि हर उदयमान गायक की प्रेरणा स्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने करियर का आगाज किया तो उन पर नूरजहाँ की गायकी का प्रभाव था। नूरजहाँ अपनी आवाज में नित्य नए प्रयोग किया करती थीं। अपनी इन खूबियों की वजह से ही वे ठुमरी गायिकी की महारानी कहलाने लगी थीं।

नूरजहाँ का जन्म 21 सितम्बर, 1926 को ब्रिटिश भारत में पंजाब के कसूर नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मदद अली था और माता फतेह बीबी थीं। नूरजहाँ के पिता पेशेवर संगीतकार थे। माता-पिता की ग्यारह संतानों में से नूरजहाँ एक थीं।1, संगीतकारों के परिवार में जन्मी नूरजहाँ को बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहाँ ने पाँच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। वे किसी भी लोकगीत को सुनने के बाद उसे अच्छी तरह याद कर लिया करती थीं। इसको देखते हुए उनकी माँ ने उन्हें संगीत का प्रशिक्षण दिलाने का इंतजाम किया। उस दौरान उनकी बहन आइदान पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं। तत्कालीन समय में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफी माँग थी।

इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 193० के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार गुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फिल्म शीला उर्फ पिंड दी कुड़ी में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। 1935 में रिलीज हुई यह फिल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने पंजाबी फिल्म उद्योग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फिल्म के गीत बहुत हिट रहे। 1930 के दशक के उत्तरार्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए थे। गायकों की बढ़ती माँग को देखते हुए नूरजहाँ का परिवार 1937 में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहाँ को सुना और गुल-ए-बकवाली फिल्म में उन्हें भूमिका दी। यह फिल्म भी काफी हिट रही और गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उनकी यमला जट (1940), चौधरी फिल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने कचियाँ वे कलियाँ ना तोड़ और बस वे ढोलना कि तेरे नाल बोलना बहुत लोकप्रिय हुए।

1942 में नूरजहाँ ने अपने नाम से बेबी शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फिल्म खानदान आई, जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन रिजवी के साथ उन्होंने विवाह कर लिया।1, बाद के समय में नूरजहाँ ने अपने से दस वर्ष छोटे एजाज दुर्रान से विवाह किया। 1943 में नूरजहाँ मुम्बई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वे अपने सभी समकालीनों से काफी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फिल्मों लाल हवेली जीनत, बड़ी माँ, गाँव की गोरी और मिर्जा साहिबाँ फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। फिल्म अनमोल घड़ी का संगीत अपने समय के ख्याति प्राप्त संगीतकार नौशाद ने दिया था। उसके गीत आवाज दे कहाँ है, जवाँ है मोहब्बत और मेरे बचपन के साथी जैसे गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं। नूरजहाँ देश के विभाजन के बाद अपने पति शौकत हुसैन रिजवी के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं।

लाहौर में रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और वहाँ शाहनूर स्टूडियो की शुरुआत की। शाहनूर प्रोडक्शन ने फिल्म चन्न वे (1950) का निर्माण किया, जिसका निर्देशन नूरजहाँ ने किया। यह फिल्म बेहद सफल रही। इसमें तेरे मुखड़े पे काला तिल वे जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फिल्म दुपट्टा थी। इसके गीत चाँदनी रातें…चाँदनी रातें आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं। देश के विभाजन के बाद जहाँ एक तरफ . आर. कारदार और महबूब खान जैसे कलाकार यहीं रह गए, वहीं बहुत-से ऐसे कलाकार भी थे, जिन्हें पाकिस्तान चले जाना पड़ा था। नूरजहाँ भी इनमें से एक थीं। भारत छोड़ पाकस्तिान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने विविध भारती में बताया था कि- आपको ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफसा-नफसी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौकत हुसैन रिजवी है। उस वक्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वकत निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती? पाकिस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फिल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- जुगनू और मिर्जा साहिबाँ।

जुगनू शौकत हुसैन रिजवी की फिल्म थी शौकत आर्ट प्रोडक्शन्स के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फिरोज निजामी ने मोहम्मद रफी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फिल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था यहाँ बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है। इस गीत की अवधि कर्रीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी, जो उस जमाने के लिहाज से काफी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौकत हुसैन रिजवी ने खुद ही लिखा था, पर हमराज गीत कोश के अनुसार फिल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।

नूरजहाँ की प्रमुख फिल्में यमला जट1940 1941 रेड सिग्नल सुसराल खानदान1942 1943 नादान दुहाई 1944. लाल हवेली1945.गाँव की गोरीबड़ी माँ भाईजान1946. अनमोल घडी जादूगर1947 जुगनू 1951 चनवे 1952 दुपट्टा 1955 फतेह खान 1956 इंतजार, लख्ते-ए-जिगर 1958 अनारकली छूमंतर 1959 परदेशियाँ कोयल 1961मिर्जा गालिब 1961 अंतिम फिल्म।
बतौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फिल्म बाजी थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फिल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फिल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा।

पाकिस्तान में पाश्र्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फिल्म जान-ए-बहार (1958) थी। इस फिल्म का कैसा नसीब लाई गाना काफी लोकप्रिय हुआ। नूरजहाँ ने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फिल्मी कॅरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में कई गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान तमगा-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया गया था। अपनी दिलकश आवाज और अदाओं से दर्शकों को मदहोश कर देने वाली नूरजहाँ का दिल का दौरा पडऩे से 23 दिसम्बर, 2000 को निधन हुआ।

1996 में ही नूरजहाँ आवाज की दुनिया से जुदा हो गई थीं। 1996 में प्रदर्शित एक पंजाबी फिल्म सखी बादशाह में उन्होंने अपना अंतिम गाना गाया था। नूरजहाँ ने अपने संपूर्ण फिल्मी कॅरियर में लगभग एक हजार गाने गाए।

2000 में जब नूरजहाँ की मौत हुई, तो उनकी एक बुजुर्ग चाची ने कहा था- जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है। नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है। तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक खास शाम का आयोजन किया था। एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए। पीर ने उस लड़की से कहा- बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ। उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे। जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा- लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी। नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फरमाइश पर गाना सख्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताजिंदगी याद रखे। सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था। वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं। नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद गुलाम मोहम्मद उर्फ गम्मे खघँ को। जरा बाजा तो मँगवाना, उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बगल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा- नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन….. टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।

दुनिया के किसी भी कोने में मैडम शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, किंतु पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार खालिद हसन ने लिखा था दिल का दौरा तो उन्हें पडऩा ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उसके, और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी।

Friday, 16 August 2019


हेमलता -16 अगस्त हैदराबाद 1954 -अब बाज़ार से लगभग गुम हैं। न नए गाने गा रही हैं, न ही किसी तरह की खबरों में ही उपस्थित हैं वह। सार्वजनिक जीवन या व्यक्तिगत जीवन भी उन का किसी को मालूम नहीं है आसानी से। पर उन के गाए गाने आज भी ज़िंदा हैं, बजते मिलते रहते हैं जब-तब, जहां-तहां। कानों और मन में मिठास बोते हुए। उन की गायकी आज भी पुकारती है। 1997 में वह एक कार्यक्रम के सिलसिले में लखनऊ आई थीं। तभी दयानंद पांडेय ने उन से यह बातचीत की थी। तब उन की नई-नई दूसरी शादी हुई थी। यह बातचीत उन के नए-नवेले पति दिलीप जी के सामने ही हुई थी। वह जैसे नई शादी की चहक में कुहुक रही थीं, मचल रही थीं। बावजूद इस चहक के वह अपने पहले पति योगेश और रवींद्र जैन के द्वारा दी गई यातना की आंच में दहक-दहक जाती थीं। रवींद्र जैन द्वारा उन का किया गया चौतरफा शोषण रह-रह कर उन की जुबान पर चढ़ जाता था। यह बातचीत थोड़ी पुरानी ज़रुर है पर बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अगर आज की बातचीत में होतीं। आज भी उतनी ही टटकी हैं। लगता है जैसे हेमलता जी से यह बातचीत कल ही हुई हो। पेश है बातचीत :
‘अखियों के झरोखों से मैं ने देखा जो सांवरे, तुम दूर नज़र आए, बड़ी दूर नजर आए’ और नदिया के पार में ‘पहुना हो पहुना’ जैसे मीठे गीत गाने वाली हेमलता आज कल सपनों के एक नए गांव में एक नई गायिकी और एक नए दांपत्य के साथ उपस्थित हैं। कोई अड़तीस भाषाओं में गाना गाने वाली सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका हेमलता दरअसल इन दिनों अपने कैरियर के दूसरे दौर में हैं। पर वह मानती हैं कि यह दूसरा दौर हमारा गोल्डेन पीरियड है। दरअसल हेमलता न सिर्फ अपनी गायिकी के कैरियर का दूसरा दौर जी रही हैं बल्कि अपनी ज़िंदगी का भी दूसरा दौर वह जी रही हैं। उन्हों ने यह दूसरी शादी की है और अपने इस दूसरे दांपत्य से वह बेहद खुश हैं। वह कहती भी हैं कि, ‘शब्दों में इसे कहा नहीं जा सकता। न आप लिख सकते हैं, न मैं कह सकती हूँ। पर अब पता चला है कि शादी क्या होती है, सुरक्षा क्या होती है जो हर पत्नी को मिलनी चाहिए। अब पता चला है। यह सब श्री माता जी के आशीर्वाद का फल है। मां ने मुझे नया जीवन दिया है।’
हेमलता बताती हैं कि, ‘एकदम से जैसे सब कुछ अपने आप होता चला गया। मैं भी आजिज हो गई थी। वह जो ‘अवेविलिटी’ (उपलब्धता) का बोर्ड माथे पर लटका पड़ा था, कि खंभे से भी बात करो तो शक। अब मैं अभय हूँ। बहुत ही खुशी सम्मान के साथ मिली है। अपने समाज में विधवा होना सचमुच बहुत बड़ा अपराध है। खास कर युवा विधवा के लिए। हर कोई उसे अपनी जागीर समझता है। पर मैं अपने पारिवारिक संस्कारों में जकड़ी हुई थी। दूसरे विवाह को गलत मानती थी, अपराध जैसा कुछ। तो उस के लिए तैयार नहीं थी। विवाह को ले कर, पति को ले कर, मेरे मन में जो एक डर था, खौफ था, शायद झूठ-मूठ का खौफ था, शायद पिछले दांपत्य का जो अनुभव था, उन सब को ले कर मैं बहुत सशंकित थी। पर अब लगता है कि यह दूसरी शादी का फ़ैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था।’ हेमलता दरअसल ज़िंदगी और गायकी दोनों ही के मोड़ पर आहत रही हैं और बेहद तनाव जीती रही हैं। गायकी में तमाम गायिकाओं की तरह हेमलता को भी ‘मंगेशकर बैरियर’ तो पार करना ही था पर हेमलता को एक और बैरियर भी पार करना था, संगीतकार रवींद्र जैन के शोषण का बैरियर। हालां कि अब वह रवींद्र जैन के शोषण बैरियर को भी पार कर चुकी हैं और मंगेशकर बैरियर तो जाने कब का पार कर लिया था। लेकिन रवींद्र जैन के शोषण को आज भी वह भूल नहीं पातीं। न ही अपने पहले बिखरे दांपत्य को। तो पहले उन के बीते दांपत्य के बिखराव की चर्चा।
वह खुद ही बताती हैं कि, ‘शादी के फेरों के बाद वह चार दिन ससुराल में रहीं। फिर सात साल पीहर में गुज़ारे। दरअसल मेरा विवाह बड़ी हड़बड़ी में हुआ और मेरी मर्जी से नहीं हुआ। दरअसल योगिता बाली के भाई योगेश ने मुझे मेरे भाई की इंगेजमेण्ट पार्टी में देखा और कहा कि शादी करुंगा तो हेमलता से। पर मैं तैयार नहीं थी। कई बातें थी। पर बड़ी बात यह थी कि घर में मैं ही एकमात्र अर्निंग मेंबर थी। छोटे तीन भाई थे। कैरियर था गा रहे थे। पर पैसे कहाँ थे? पर योगेश जी ज़िद पर अड़े रहे। तो तय हुआ कि इंगेजमेंट के पांच साल बाद शादी होगी। तो उन्हों ने हां कर दिया। पर इंगेजमेंट के बाद ही वह अड़ गए कि 48 घंटों में शादी करिए नहीं इंगेजमेंट तोड़ देंगे। तो बाबा ने शादी करवा दिया। पर शादी के चार दिन बाद ही ससुराल से वापस लौटा दिया। सात साल पीहर में रही। यह बात दूर दूर तक फैल गई। पर मेरे पास यह सब सोचने के लिए समय नहीं था न! तब तो मैं स्टार गायिका हो गई थी। फिर कोई छह बरस बाद अचानक उन का आविर्भाव हुआ। कंप्रोमाइज की बातें की। माफिया मांगीं। जैसा कि होता है, मां बाप की मर्जी मान कर जाना पड़ा। फिर जब दुबारा गई ससुराल तो उस का शुभ परिणाम भी मिला। एक बेटा आदित्य मिला जो अब 15 साल का है और नौवीं में पढ़ता है। पर जब बेटा छह महीने का था, तभी पीहर फिर वापस आना पड़ा। जब बेटा छह साल का हुआ तो उस के पिता का निधन सिरोसिस ऑफ लिवर की बीमारी से हो गया।
यही वह वक्त था जब जनवरी 1989 से ले कर आने वाले तीन साल तक मैं एक तरह से साइलेंस में चली गई। यह सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ। लेकिन फिर हम कलाकारों के साथ होता ही है कि ‘शो मस्ट गो ऑन’ तो मेरे होशो हवास वापस आए, वाणी वापस आई। सात सुरों के बीच रहने की राह निकल आई। और सब से बड़ी बात यह हुई कि 1990 में माता निर्मला से मेरा साक्षात्कार हुआ। यह मेरे लिए बड़ा मुश्किल वक्त था। फ़िल्म इंडस्ट्री का माहौल बिगड़ चुका था। लड़ाई टैलेंट की नहीं, संगीतकारों की नहीं बल्कि कंपनियों की चल रही थी। और एक व्यवसाई तो संगीत समझने से रहा। गुलशन कुमार या चंपू जी संगीत को कोई जस्टिफिकेशन दें, तो इन्हें कनविंस करना मेरे वश की बात नहीं थी। ऐसे माहौल में श्री माता जी का आशीर्वाद मुझे मिला। माँ ने मुझे नया जीवन दिया। मेरा अभ्यास पहले दिन की तरह शुरु हो गया, वह लगन बरकरार रही। और जो मेरा यह दूसरा विवाह हुआ है इस में श्री माता जी के अलावा 50 प्रतिशत मेरी सास का हाथ है। दिलीप जी मुझे मेरे पहले पति योगेश जी के घर से ही विदा करा कर लाए। मेरी पुरानी सास पढ़ी-लिखी हैं, मेरी ननद योगिता बाली मुझ से बहुत प्यार करती हैं। और जब मैं विधवा हुई थी तो योगिता ही सब से पहली व्यक्ति थीं जिन्हों ने मुझ से कहा ‘शादी तुरंत करो।’ शायद इस लिए भी कि योगिता-मिथुन का ‘पास्ट’ था। पर आज दोनों खुश हैं। फिर मेरे दिमाग में रिमैरेज एक बहुत बड़ा टैबू थी, हव्वा थी। कभी-कभी लगता है कि श्री माता जी की बात पहले क्यों नहीं मान ली।’
‘अगर योगेश जी जीवित होते तो भी क्या आप दिलीप जी से दूसरी शादी कर सकती थीं?’ पूछने पर हेमलता बोलीं, ‘बिल्कुल कर सकती थी। करना चाहिए था मुझे। नहीं कर के गलती की थी। क्यों कि मैं इसे धर्म से जोड़ कर देखती थी। तथाकथित परंपरा और संस्कारों को निभा रही थी। पर सच यह है कि धारणा से ही धर्म होता है। ‘धारायति इति धर्म:।’ कितना पहले दूसरी शादी कर लेनी चाहिए थी? हेमलता बोलीं, ‘उन चार दिनों के बाद ही। अप्रैल 1973 में। पर तब डिवोर्सी शब्द से भय था। छोड़ी हुई औरत के धब्बे से नहीं डरती तब तो अच्छा था। पर तब तो धर्म यह था कि, मेरा पति देवता है।’ वह बोलीं, ‘जब दूसरी बार योगेश जी मुझे लेने आए थे तो मैं ने उन से दो सवाल पूछे थे। पहला यह कि मुझे क्यों छोड़ा? और दूसरा यह कि अब क्यों लेने आए हो? मेरा सिंगर होना अगर अयोग्यता थी तो ब्याह क्यों किया? जो जवाब उन्हों ने दिया वह कल्पना से परे था। तुम ने कहा था कि पांच साल बाद शादी करोगी तो पांच साल के लिए तुम्हें भेज दिया था। मैं ने कहा कि यह बात इंगेजमेंट के बाद कही थी, शादी के बाद नहीं। तो कहने लगे तुम जैसी लड़की को मिस नहीं करना चाहता था। और जानता था कि विवाह के बाद तुम मुझे छोड़ोगी नहीं।’
यह पूछने पर कि ‘तो क्या उन के इस कहे में आप को ईमानदारी दिखी थी?’ पूछने पर हेमलता बोलीं, ‘उनके इस कहे में ईमानदारी ढूंढ लेना ही तब भलाई थी। परिवार की इज्जत थी’। ‘मंगेशकर बैरियर कैसे तोड़ा आप ने?’ पूछने पर वह बोलीं, मैं ने नहीं तोड़ा। सब कुछ अपने आप हो गया। पर यह सही है कि मंगेशकर बैरियर था एक समय। सोलो तो छोड़िए कोरस भी उन्हीं की मर्जी से गाया जा सकता था। पर राजश्री ने मेरी मदद की और यह सिलसिला शुरु हुआ ‘गीत गाता चल से’ तो भी मेरी बात तो बनी ही नहीं थी। फिर चितचोर में दो गाने डुएट गाए तो लाइमलाइट में आई। हालां कि 1969-70 में विश्वास फ़िल्म में मुकेश के साथ ‘ले चल मेरे जीवन साथी ले चल’ तेरह साल की उम्र में कल्याण जी आनंद जी के संगीत में गाया था। फिर उषा खन्ना के संगीत में ‘एक फूल एक भूल’ फ़िल्म में ‘दस पैसे में राम ले लो’ गाया था, तीसरा गाना ‘जीने की राह’ फ़िल्म में ‘चंदा को ढूंढने सभी तारे निकल पड़े’ गाया था। एस. डी. बर्मन के संगीत में ज्योति फ़िल्म में भी गाया। पर लाइम लाइट में आई फकीरा फ़िल्म के गाने से, ‘फकीरा चल चला चल।’ मेरा गांव, मेरा देश और कच्चे धागे जैसी फ़िल्मों में कई हिट गीत इस के पहले गाए थे।
हालां कि 1968 में नौशाद साहब ने मुझ से पांच साल का एग्रीमेंट कराया था कि मैं कहीं और नहीं गाउंगी। पर 1969 में यह एग्रीमेंट डिसओबे करना पड़ा। क्यों कि जब सभी बारी-बारी नाराज होने लगे तो लक्ष्मीकांत जी ने मेरे पिता से कहा कि इन पांच सालों में किस-किस को नाराज करेंगे? हालां कि नौशाद साहब मेरे लिए कहते थे कि हेमलता में क्वालिटी ऑफ लता मंगेशकर और दि इनोसेंस ऑफ नूरजहां दोनों है। चूंकि मुझे लाने वाले नौशाद साहब थे तो लोगों ने बगैर मुझे सुने सिंगर मान लिया। पर एग्रीमेंट तोड़ने का नौशाद साहब ने आज तक बुरा नहीं माना। कम से कम मुझ से कुछ नहीं कहा। देखिए बड़े लोग कितने महान होते हैं। बावजूद इस के उन्हों ने फकीरा में मुझे चांस दिया। जब कि तब वह बहुत हर्ट थे। पर मैं आज तक हर्ट हूँ। इस बात का दुख हमेशा रहेगा। पर यह फ़ैसला मेरा नहीं, मेरे पिता का था।
‘रवींद्र जैन से आप का अलगाव क्यों हुआ?’ पूछने पर हेमलता बोलीं, ‘शोषण की स्थिति इस सीमा तक चली गई कि मन खराब हो गया। वह मेरे बाबा के शिष्य थे, और मेरे गुरु। मुझ से गलती यह हुई कि काम और व्यापार में मैं ने संबंधों का महत्व निभाना शुरु कर दिया । जिन हालातों में मैं जी रही थी, यही इंप्रेशन था कि एक वही परिवार है जो मुझे प्यार करता है। लेकिन जब यह भ्रम टूटा तो अपनी ओर लौटने का मौका मिला। होता यह था कि मेरी सारी मेहनत, सारा एफर्ट उन्हीं के नाम से जाना जाता था। ‘उन से अलग होने की कीमत भी क्या चुकानी पड़ी है आप को?’ पूछने पर वह बोलीं, ‘अलग होने की कीमत तो नहीं पर उन से जुड़ने की कीमत ज़रूर चुकाई है। कहीं बहुत ज़्यादा। जहां सौ रुपए मिलते थे वहां बहुत मुश्किल से पांच रुपए दिए गए। लोगों ने मुझे एक ग्रुप की सिंगर कह कर काट दिया। फ़िल्म इंडस्ट्री के कुछ गंदे स्ट्रेट मेकर्स भद्दे कमेंट्स के जरिए अपमानित करते हैं, उन का भी शिकार बनना पड़ा कुछ दिनों के लिए। लेकिन बात में न सत्य था न तथ्य। तो हम अपनी जगह पर जमे रहे। काम करते रहे। पर चारो ओर से मेरे कैरियर को काटना शुरू किया गया। मेरे टेलीफ़ोन पर गलत जवाब जाते थे। 1942 ए लव स्टोरी के लिए आर. डी बर्मन ने मुझे कई बार तलाशा। कोई ग्यारह महीने तक वह तलाशते रहे पर ‘नहीं है’ का जवाब उन्हें मिलता रहा। तो इस तरह की मेरे खिलाफ साजिश चलती रही।’
‘पर कहा जाता है कि रवींद्र जैन ने आप को कैरियर दिया है?’ पूछने पर बह झल्ला कर बोलीं, ‘रवींद्र जैन के साथ जब गाना शुरू किया उस से पहले कोई एक हज़ार गाने मैं गा चुकी थी’। यह पूछने पर कि ‘कैरियर का सब से बढ़िया समय आप का कौन था?’ हेमलता बोलीं, कैरियर का सब से बढ़िया समय यही समय है। जिस से मैं अभी गुज़र रही हूँ। हर गीत एक चैलेंज की तरह है। परफॉर्मेंस में मज़ा आ रहा है। मैं चाहती हूँ कि इस में कुछ बदलाव आए। इस बदलाव का बहाना मैं बनूं। तो बहुत अच्छा, बहुत स्वीट दौर आएगा। ‘आप लोकभाषाओं की गायकी में जो टच देती हैं वह कैसे बन पड़ता है?’ हेमलता बोलीं, अलग-अलग लोकल डिक्शन पकड़ना मेरी हॉवी रही है। 38 भाषाओं में मैं गा रही हूँ। 14 भाषाओं के डिक्शन पर रिसर्च किया है। पर सब से बड़ा कॉम्पलीमेंट मुझे इटली में एक ओपेरा सिंगिग ग्रुप के साथ गाए गीत में मिला। जैसे आप पूछ रहे हैं वैसे ही वहां के लोगों ने भी पूछा कि इतना लोकल डिक्शन कैसे आ गया? वैसे मैं अफ्रीकन, जूलो, मुल्तानी, सरायकी, पोरचुकी भाषाओं में भी गा रही हूँ। पर मुझे सब से प्रिय है हिंदी गीत गाना। महादेवी और मैथिली शरण गुप्त मेरे प्रिय कवि हैं।
‘पर ऐसे गीत कहां गाए हैं आप ने?’ पूछने पर वह बोलीं, ‘गाए तो हैं पर वह मिले कम हैं। दिक्कत यह है कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में सिंगर का हस्तक्षेप नहीं होता। मुझे कई बार बीच गाने में छोड़ कर भागना पड़ता है। जैसे कि सावन कुमार की ‘खलनायिका’ में चोली वाला गीत छोड़ कर भागना पड़ा। ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी भी छोड़ना पड़ा था’। ‘इन दिनों किस बैरियर से गुजर रहीं हैं?’ हेमलता बोलीं, ‘बैरियर न पहले कमज़ोर था न अब है। पर पहले मंगेशकर बैरियर के बावजूद, पोलिटिक्स के बावजूद संगीत तो था। पर आज के बैरियर में कला की बात ही नहीं। न आवाज़ की न डिक्शन की। आज जिन चीजों की ज़रूरत है, वह न मुझ में है और न मैं हो सकती हूँ। आई एम टू लेट। दूसरा जन्म लेना पड़ेगा। गानों में अब पंचिंग सिस्टम हो गया है। डबिंग सिस्टम हो गया है। अब जब सिंगर को ही गाना याद नहीं रहता तो पब्लिक को क्या याद रहेगा?
‘इन दिनों क्या कर रहीं है आप?’ वह बोलीं, रिकॉर्डिंग अपने ही गानों की। फ़िल्मों में जो गा रही हूँ, वो तो गा ही रही हूँ। मेरे पति दिलीप साहब ने एक म्युजिक कंपनी लांच कर ली है। इन्हों ने मेरा अलबम रिकार्ड किया है गुरूवाणी, गुरुग्रंथ साहब से। पाकिस्तानी गायक अताउल्ला खान के साथ एक म्युजिक ट्रैक अभी लंडन में डब किया है। पर सब से मज़े की बात यह है कि 16 साल से जिस अताउल्ला खान को हिंदुस्तान के लोग सुन रहे हैं वह डुप्लिकेट फेक आवाज़ है। जो टी-सीरिज द्वारा जारी किया गया है। पर असली अताउल्ला खान बहुत जल्दी आप के सामने होंगे। हमारे साथ। अलबम का टाइटिल रखा है ‘सरहदें’। सरहदें में 6 डुएट्स हैं और एक-एक सोलो। पर अताउल्ला खान के फर्जी होने को भी हम इस के साथ ही पर्दाफाश करेंगे। जो अताउल्ला खान दरअसल टी सीरिज पर गा रहें हैं वह दरअसल गुड़गांव के एक शर्मा जी हैं।’ लेखक दयानंद पांडेय सरोकारनामा
Talat Mahmood and Madan Mohan excel in this song from Jahan Ara (1964). The movie had several great songs includingMain Teri Nazar Ka Suroor Hoon and Teri Aankh Ke Ansoo by Talat and Woh Chup Rahen To Mere and Haal-E-Dil Yoon Unhe Sunaayaa Gayaa by Lata.

Jahan Ara was the daughter of Shah Jahan and the story is about her love for Mirza Yusuf Changezi, which she had to give up as she was a Mughal princess. It had Prithiraj Kapoor playing the role of Shah Jahan and Mala Sinha playing Jahan Ara and Bharat Bhushan playing Mirza.  Music is composed by Madan Mohan and lyrics are by Rajinder Krishan. 

However, the movie was a big flop. 





फिर वोही शाम वही ग़म वही तनहाई है
दिल को समझाने तेरी याद चली आई है

फिर तसव्वुर तेरे पहलू में बिठा जाएगा
फिर गया वक़्त घड़ी भर को पलट आएगा
दिल बहल जाएगा आखिर ये तो सौदाई है
फिर वोही शाम ...

जाने अब तुझ से मुलाक़ात कभी हो के न हो
जो अधूरी रहे वो बात कभी हो के न हो
मेरी मंज़िल तेरी मंज़िल से बिछड़ आई है
फिर वोही शाम ...

फिर तेरे ज़ुल्फ़ के रुखसार की बातें होंगी
हिज्र की रात मगर प्यार की बातें होंगी
फिर मुहब्बत में तड़पने की क़सम खाई है
फिर वोही शाम ...

Thursday, 15 August 2019

"तेरे चेहरेसे नज़र नहीं हटती
नज़ारे हम क्या देखें..."

साहिर लुधियानवी का यह गाना पिछले साल एक टीव्ही शो में सदाबहार ऋषि कपूर और नीतू सिंह (कपूर) को उसी अंदाज में देखकर याद आया था!

'कभी कभी' (1976) के "तेरे चेहरेसे नज़र नहीं हटती." गाने में ऋषि कपूर और नीतू सिंह!
चालीस साल पहले बनी 'कभी कभी' (१९७६) इस यश चोप्रा की फ़िल्म में दोनों ने यह गाना जवानी की पूरी जोश में बडी रुमानी तरीके से पेश किया था!

उसी वक्त ऋषि कपूरजी की 'खुल्लमखुल्ला' नाम से.. आटोबायोग्राफी रिलीज हुई! यह शिर्षक उनके और नीतू सिंहजी के 'खेल खेल में' (1975) फ़िल्म के लोकप्रिय गाने से लिया गया!..

'खेल खेल में' (1975) के "एक मैं और एक तू.." गाने में नीतू सिंह और ऋषि कपूर!

इसी फ़िल्म का "एक मैं और एक तू..दोनों मिले इस तरह.." गाना उन्होंने सेम स्टाईल उस प्रोग्राम में पेश किया!..ऋषिजी के डान्सिंग स्टेप्स बडे खास हुआ करते थे..वह तब वैसेही लगे..
और नीतू सिंहजी का मॉडर्न अंदाज भी!...सुना था कि 'याराना' (1981) फ़िल्म में उन्होंने अमिताभ बच्चन को फ्लोअर पर डान्स में गाईड किया था!

चाँद मेरा दिल..!


'हम दिल दे चुके सनम' (१९९९) के "चाँद छुपा बादल में." गाने में सलमान खान-ऐश्वर्या राय!

सुहानी चाँद रात के बाद आयी इस ईद के मौके पर..इससे जुड़े अपने सिनेमा के हसीन लम्हें याद आएं..जो आशिक़ाना मिज़ाज के हम जैसों के क़रीब हैं!

'बरसात की रात' (१९६०) के "मुझे मिल गया बहाना." गाने में श्यामा!
इसमें शुरू में मन में गूँजा 'बरसात की रात' (१९६०) का गाना..
"मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का
कैसी ख़ुशी ले के आया चाँद ईद का.."


लता मंगेशकर ने गाया यह गाना परदे पर श्यामा ने लाजवाब साकार किया था और ढ़ोलक बजा रही थी रत्ना..जिसके पति (भारत भूषण) इस फ़िल्म के नायक थे और नायिका..मलिका-ए-हुस्न मधुबाला!

'दिल ही तो है' (१९६३) के "निगाहें मिलाने को.." गाने में नूतन!
कुछ अपनी महबूबा या महबूब का दीदार करने के लिए ऐसा बहाना चाहतें हैं! लेकिन साहिर लुधियानवी ने महबूब में ही चाँद देखकर ईद समझ ली और 'दिल ही तो है' (१९६३) में लिखा..
"जब कभी मैंने तेरा चाँद सा चेहरा देखा
ईद हो या के ना हो, मेरे लिए ईद हुई..!''


वैसे अपने महबूब को चाँद मानने की बात हमारे सिनेमा के परदे पर हमेशा रूमानी तरीके से कहीं गयी हैं..जैसे की 'दिल्लगी' (१९४९) में नौशाद के धून पर ख़ूबसूरत गायिका-अभिनेत्री सुरैय्या का श्याम के साथ "तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी.." गाकर झूलना! तो अनंतकुमार और नंदा अभिनीत 'बरखा' (१९५९) में मुकेश और लता मंगेशकर का अच्छा डुएट था "एक रात में दो दो चाँद खिले..एक घुंगट में एक बदली में.."

'चौदवी का चाँद' (१९६०) के शीर्षक गीत में रूमानी होतें गुरुदत्त और वहिदा रहमान!
फिर संवेदनशील अभिनेता गुरुदत्त ने अपनी फ़िल्म 'चौदवी का चाँद' (१९६०) के शीर्षक गीत में वहिदा रहमान पर जैसे तारीफों के फूल बरसाएं हैं..इसमें शकील बदायुनी की शायरी और रवि के संगीत में मोहम्मद रफ़ी की उस अंदाज़ में गायकी का कमाल भी हैं!..मेरे पसंदीदा रूमानी गानों में से यह एक हैं।

बाद में 'मैं चुप रहूँगी' (१९६२) में तो राजेंद्र कृष्ण ने ऐसा लिखा था की जैसे प्रेमियों का नूर देखकर चाँद और चाँदनी भी शरमा गएँ हो! उनके गीत से सुनील दत्त इसमें मीना कुमारी को कहता हैं "चाँद जाने कहाँ खो गया..तुमको चेहरे से परदा हटाना न था.." उसपर मीना कुमारी उसे कहती हैं "चाँदनी को ये क्या हो गया..तुमको भी इस तरह मुस्कुराना न था.."

'मैं चुप रहूँगी' (१९६२) के "चाँद जाने कहाँ खो गया." गाने में सुनील दत्त और मीना कुमारी!
लेकिन कभी-कभी तो.. प्रेमिका को चाँद का देखना भी गवारा न हुआ! जैसे राज कपूर के 'आवारा' (१९५१) में नर्गिस कहती हैं "दम भर जो उधर मुँह फेरे..ओ चँदा, मैं उनसे प्यार कर लूंगी.." इसमें प्यार का एक जुनून नजर आता हैं! बाद में 'लव मैरेज' (१९५९) में तो देव आनंद चाँद को इशारा करता हैं "धीरे धीरे चल चाँद गगन में.." और उसकी महबूबा माला सिन्हा उनके जज़्बा आगे और बयां करती हैं "कही ढल ना जाये रात, टूट ना जायें सपनें.."

'लव मैरेज' (१९५९) के "धीरे धीरे चल चाँद गगन में." गाने में देव आनंद और माला सिन्हा!
वैसे अपनी हसीन महबूबा की तारीफ़ चाँद का हवाला देकर करना यह हमारें रूमानी सिनेमा में बरक़रार रहा..जैसे 'कश्मीर की कली' (१९६४) में शम्मी कपूर ने "ये चाँद सा रोशन चेहरा.." ऐसा अपनी मस्ती में गाकर शर्मिला टैगोर के हुस्न की तारीफ की थी! तो कभी प्रेमी ने प्रेमिका से चाँद के पार चलने की बात भी की..जैसे 'पाक़ीज़ा' (१९७२) में राज कुमार ने मीना कुमारी को लेकर अपने धुंद में गाया था "चलो दिलदार चलो.." 

बाद में एक वक़्त ऐसा आया जब प्रेमी ने चाँद से यह कहलवाया की, उसकी प्रेमिका जैसी ख़ूबसूरती आसमाँ में भी नहीं..इसमें आनंद बक्षी की शायरी ख़ूब रंग लायी..फ़िल्म 'अब्दुल्ला' (१९८०) के लिए उनके कलम से निकला नग़्मा उसी शायराना अंदाज़ में मोहम्मद रफ़ी ने गाया "मैंने पूछा चाँद से के देखा है कही मेरे यार सा हसीन..चाँद ने कहा चाँदनी की कसम नहीं.." और परदे पर संजय खान ने ज़ीनत अमान के साथ रूमानी तरीके से यह पेश किया!
'अब्दुल्ला' (१९८०) के "मैंने पूछा चाँद से." गाने में रूमानी अंदाज़ में ज़ीनत अमान-संजय खान!

आगे भी अपनी महबूबा जैसा हुस्न चाँद के पास नहीं हैं ऐसा कहना हमारें सिनेमा की रूमानियत को निखारता गया..जैसे 'हम दिल दे चुके सनम' (१९९९) में ऐश्वर्या राय को लेकर सलमान खान कहता हैं "चाँद छुपा बादल में शरमा के मेरी जाना.."