Friday, 26 April 2019

बालिका बधू

Saturday, 20 April 2019

दिल में उतरने वाले शायर


दिल में उतरने वाले शायर


1952 आन ‘खेलो रंग हमारे संग’। संगीतकार नौशाद गीतकार- शकील बदायूंनी ,1957 मदर इंडिया ” होली आई रे कन्हाई ” संगीतकार नौशाद- गीतकार शकील बदायूनी,1960 कोहिनूर ” तन रंग लो जी आज मन रंग लो” संगीतकार नौशाद- गीतकार शकील बदायूनी,1966 फूल और पत्थर ” लाई है हजारों रंग होली” संगीतकार रवि- गीतकार शकील बदायूनी-
शकील बदायूंनी ने फ़िल्म जगत में 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ से क़दम रखा और अपने जीवन के अन्तिम समय तक फ़िल्म-संगीत की सेवा करते रहे। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में जब शकील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी ने मिल कर “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” जैसी रचना का निर्माण किया, तब यह साम्प्रदायिक सदभाव का मिसाल बन गया। आगे चल कर भी शकील साहब ने श्री कृष्ण और राधा से संबंधित कई गीत लिखे। 1954 की फ़िल्म ’अमर’ में “राधा के प्यारे कृष्ण कन्हाई, तेरी दुहाई तेरी दुहाई” से इसकी शुरुआत हुई थी। और फिर जब उनकी कलम से होली के लिए गीत लिखे गए, तब उनमें केवल रंगों का ही नहीं बल्कि राधा-कृष्ण के रास का उल्लेख करते हुए इन गीतों को अमर कर दिया। शकील का लिखा पहला होली गीत था फ़िल्म ’मदर इंडिया’ में। शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ में “होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी” आज भी उसी ताज़गी से सुना जाता है जितना उस ज़माने में यह गीत मशहूर हुआ था। और मज़े की बात देखिए कि इस गीत में भी वही ’बैजु बावरा’ वाले गीत जैसा संयोग। शकील, नौशाद और शमशाद बेगम ने फिर एक बार धर्मनिरपेक्षता का मिसाल कायम किया। इस गीत को हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरहिट होली गीत माना जाएगा। हालाँकि इससे पहले भी कुछ होली गीत फ़िल्मों में आ चुके थे, उदाहरणत: “होरी आई रे कान्हा बृज के बसिया” (जीवन प्रभात, 1937), “मोपे डार गयो सारी रंग की गागर” (कॉमरेड्स, 1939), “फागुन की रुत आई रे, ज़रा बाजे बांसरी” (होली, 1940), “भिगोई मोरी सारी (साड़ी) रे, देखो भीगे न चोली” (शादी, 1941), पर इनमें से किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जितना ’मदर इंडिया’ के गीत को मिली। इस गीत के अन्तरे में शकील साहब लिखते हैं “बरसे गुलाल रंग मोरे आंगनवा, अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा”। किसी के रंग में रंगने की बात इसके बाद फिर कई गीतों में सुनने को मिली। इसी तरह से दूसरे अन्तरे में उन्होंने लिखा “छूटे ना रंग ऐसी रंग दे चुनरिया, धोबनिया धोये चाहे सारी उमरिया”। चुनरिया को प्रेम के रंग में रंगने की बात भी समय समय पर हमें सुनने को मिला है। फ़िल्म के सितुएशन के मुताबिक नरगिस के मन की पीड़ा को तीसरे अन्तरे में क्या ख़ूब उभारा है शकील साहब ने जब वो लिखते हैं “होली घर आयी तू भी आजा मुरारी, मन ही मन राधा रोये बिरहा की मारी”। यूं तो इस गीत का अधिकांश भाग कुमकुम पर फ़िल्माया गया है, पर शुरुआती नृत्य संगीत में प्रख्यात कथक नृत्यांगना सितारा देवी का नृत्य भी शामिल है जिसमें वो पुरुष वेश में कुमकुम के साथ नृत्य करते हैं।
1960 में शकील बदायूंनी साहब का लिखा दूसरा होली गीत आया। फ़िल्म ’कोहिनूर’, गीत “तन रंग लो जी आज मन रंग लो, खेलो उमंग भर रंग प्यार के ले लो”। नौशाद के संगीत में मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और साथियों का गाया यह गीत दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया है। भले यह फ़िल्म श्याम-श्वेत थी, पर शकील साहब ने अपने शब्दों से इस गीत में ऐसे रंग भरे हैं कि इसे सुनते हुए हमारी आंखों के सामने होली का रंगीन दृश्य साकार हो उठता है। होली का त्योहार सिर्फ़ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि हँसी-मज़ाक, मीठी नोक-झोक और छेड़-छाड़ का भी है। इसलिए होली गीतों में अक्सर हमें प्रेमियों के आपसी छेड़-छाड़ के प्रसंग सुनने को मिलते हैं। शकील साहब ने इस गीत में छेड़-छाड़ के लिए लिखते हैं “आज मुखड़े से घुंघटा हटा लो जी, हो ज़रा सजना से अखियाँ मिला लो जी”, जिसके जवाब में नायिका कहती हैं “रंग झूठे मोरे तन पे ना डालो जी, मन प्यार में साजन रंग लो”। यानी कि फिर से बात प्यार के रंग पे आकर टिकटी है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि शकील साहब के लिखे होली गीतों में राधा-कृष्ण का प्रसंग ज़रूर आता है, इस गीत के चौथे अन्तरे में भी उन्होंने बड़ी सुन्दरता से लिखा है “राधा संग होली खेले बनवारी रे हो, अंग अंग पे चलाए पिचकारी हो, कहे बैंया पकड़ के अनारी, दिल रंग लो जी धड़कन रंग लो”। फ़िल्म-संगीत समीक्षक कार्तिक जी ने इस गीत के बारे में कहा है कि श्याम-श्वेत फ़िल्मों में आनेवाली होली गीतों में यह गीत सबसे ज़्यादा रंगीन है, और बिल्कुल जिस तरह से उत्तर भारत में होली खेली जाती है, ठीक वैसे ही इस फ़िल्माया गया है। “आज मुखड़े से घुंघटा…” में जो रोमान्स है, वह कमाल का है। उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि यह गीत और ’मदर इंडिया’ का गीत “दुख भरे दिन बीते रे भैया”, ये दोनों गीत शकील-नौशाद का गीत है और दोनों गीतों को मेघ मलहार राग पर आधारित किया गया है। यह वह राग है जो वर्षा ऋतु में गाया जाता है। अत: यह दिलचस्प बात है कि किसी होली गीत को मेघ मलहार पर आधारित किया जाए! कार्तिक जी आगे लिखते हैं कि इन दो गीतों में जो समानता है, वह यह है कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश रहा है जहाँ वर्षा को ख़ुशी का प्रतीक माना जाता है। और क्योंकि होली भी ख़ुशी का त्योहार है, इसलिए ये दोनों गीत आपस में जुड़े हुए हैं। “दुख भरे दिन…” में भी शकील साहब लिखते हैं, “सावन के संग आए जवानी, सावन के संग जाए…”।
1966 में एक फ़िल्म आई थी ’फूल और पत्थर’। धर्मेन्द्र – मीना कुमारी अभिनीत इस फ़िल्म ने धर्मेन्द्र को स्टार बना दिया। इस फ़िल्म ने उस साल कई पुरस्कार भी जीते। फ़िल्म में संगीत था रवि का और गीत लिखे शकील ने। नौशाद साहब के बाद शकील ने जिन संगीतकारों के साथ सबसे ज़्यादा काम किया है, उनमें से एक थे रवि साहब। ’फूल और पत्थर’ में आशा भोसले और साथियों का गाया एक होली गीत था “लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए”। गीत लक्ष्मी छाया पर फ़िल्माया गया था। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि हालातों ने शाका (धर्मेन्द्र) को एक असामाजिक तत्व (डाकू) बना दिया था। जब एक महामारी ने पूरे कस्बे को ख़ाली करवा दिया, तब शाका को एक घर में डकैती करने का मौका मिल गया। लेकिन घर के अन्दर घुस कर उसे कुछ नहीं मिला सिवाय शान्ति के – शान्ति (मीना कुमारी) एक विधवा औरत, जिसे उसके निर्दयी रिश्तेदारों ने उसे मरने के लिए छोड़ गए। शाका उसका देखभाल कर उसे स्वस्थ कर देता है। जब घरवाले वापस आकर शान्ति को जीवित देखते हैं तो ख़ुश नहीं होते। और तो और घर में पराए मर्द को देख कर शान्ति के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। शाका और शान्ति वहाँ से भाग कर शाका के घर में अपना नया संसार सजाने की कोशिश करते हैं। पर समाज की नज़रों उन्हें चैन से जीवन व्यतीत करने नहीं देते। इस बीच दोनों में प्रेम के पुष्प खिलते हैं।
इस होली गीत का सिचुएशन ऐसा है कि होली की सुबह है, शाका बिस्तर पर बीमार बैठा है, उसके सर पर पट्टी बंधी हुई है। ऐसे में शान्ति उसके लिए प्लेट पर कुछ लाती है। प्लेट लेते हुए शाका शान्ति के हाथों में अपना हाथ फेर कर अपने प्यार का इज़हार करता है। शान्ति शर्माकर खिड़की की तरफ़ जाती है और बन्द खिड़की को खोल देती है। नीचे झाँकती है तो होली की टोली हुड़दंग मचा रही है। गीत शुरु होता है “लाई है हज़ारों रंग होली”। नीचे होली खेलटी खुले में हँस खेल रही है और उपर शान्ति मन ही मन मुस्कुरा रही है। इसी दृश्य को समझाने के लिए शकील साहब ने “कोई तन के लिए” और “कोई मन के लिए” का कितना सुन्दर प्रयोग किया है! पूरा का पूरा गीत सिम्बॉलिक यानी कि प्रतीकात्मक है। पहले अन्तरे में शकील लिखते हैं “कोई तो मारे भर पिचकारी, कोई रंग डाले नज़र मतवाली, कोई भीगे बदन हिचकोले पवन बोले, कहीं मचले जिया साजन के लिए”। शान्ति की जिया भी शाका के लिए मचल रहा है जो शान्ति के मुखमंडल पर साफ़ दिख रहा है। दूसरे अन्तरे में शान्ति की आंखों में पिया-मिलन की आस को दर्शाने के लिए शकील लिखते हैं “प्यार में लगे मधुर जोरा-जोरी, रंग बरसाये कन्हैया गोरा गोरी, ओ रूप देखो रचे है कैसे कैसे सजे हैं कैसे कैसे, अरमान भरी अखियों के लिए, लायी है हज़ारों रंग होली”। और तीसरे अन्तरे में तो बिल्कुल साफ़-साफ़ कहा गया कि “तन पे रंग हो तो सारा जग जाने, मन के रंग को तो कोई ना पहचाने, कहीं पायल छन छन बाजे, किसी का दिल नाचे, आई कैसी ख़ुशी जीवन के लिए”। शान्ति के मन में हज़ारों रंग जैसे एक साथ उछल पड़े हों, नीचे नाचती गाती लड़कियों के पायल बज रहे हैं और उपर शान्ति का मन ख़ुशी से नृत्य कर रहा है। कुल मिला कर फ़िल्म की कहानी और सिचुएशन के हिसाब से शकील साहब ने कमाल का लिखा है यह प्रतीकात्मक होली गीत।

प्यार के लिए कुर्बान किया था करियर

Sunday, 14 April 2019

शमशाद बेगम

Saturday, 13 April 2019

बलराज साहनी

Thursday, 11 April 2019

कुंदन लाल सहगल

कुंदन लाल सहगल


कुंदन लाल सहगल आज तक उनके बारे में कई बार लिखा गया है, कई सुनायी गयी बातें जो उनके दोस्तों, सहकर्मियों ने, रिश्तेदारों ने सुनायी । उनका हाथ का लिखा हुआ कुछ या उनका इंटरवियू कोई सामग्री मौजूद नहीं है जिनसे उनकी शख्सियत को पूरी तरह जाना जा सके । उनके साथ रहे लोग भी कितने बचे हैं अब ? नौशाद, केदार शर्मा, के एन सिंह जैसे कुछ सहकर्मियों ने वक्त वक्त पर उनके साथ बिताये गये समय का ज़िक्र किया है लेकिन उनके अपने आत्मकथन के बिना इस महान अदाकार के ज़िंदगी के सोये हुये पहलू कभी सामने नहीं आ सके । जगदीश सेठी, पृथ्वी राज कपूर उनके मित्रों में से थे । गुज़रे वक्त में प्रसार माध्यमों की गैर मौजूदगी की वजह से हमारे चालीस व पचास के दशक के ढ़ेर से फनकारों की जीवन संघर्ष की कहानियां हम तक कभी नहीं पहुंची । मोतीलाल, चन्द्रमोहन, ज़ोहरा बाई, अमीर बाई जैसे अनगिनत कलाकार, गायक हैं जिनके साक्षात्कार, व उनकी कोई तसवीर के लिये पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी तरसते हैं ।
कुंदन लाल सहगल  अपने गाये करीब ढ़ाई सौ गानों के ज़रिये अवाम में आज भी ज़िंदा हैं । जब तक अच्छा संगीत सुननेवाले इस दुनिया में रहेंगे तब तक सहगल की आवाज़ हमेशा फ़ज़ा में गुंजेगी । अपने छोटे से जीवनकाल 11 अप्रैल 1904 से 18 जनवरी 1947 यानी गायकी जीवन के पंद्रह से भी कम सालों में गिनी चुनी फिल्में और इतने कम गानों के साथ अपने समय में वे लोकप्रियता की हद तक पहुंचे ।
आम आदमी राग रागिनी, सुरताल को नहीं पहचानता फिर भी उसे ‘झूलना झुलाओ…’ और ‘राधे रानी दे डारो ना…’ जैसे गानों के भीतर डूबता देखा गया है । संगीत की कोई बाकायदा तालीम न लेते हुए गलियों के गायकों, सुफि़यों के संग गाने वाले इस सहज पर बुलंद आवाज़ के धनी ने भजन और ग़ज़लें एक से सातत्य से गायीं हैं । उनका पसंदीदा राग भैरवी था । भैरवी ही संगीतकार नौशाद व शंकर जयकिशन का भी पसंदीदा राग था ।
उनकी ग़ज़लें स्पष्ट भाषाई उच्चारण व अदा के नमूने हैं । ग़ालिब —’दिल से तेरी निगाह जीगर तक उतर गयी…’, ‘इश्क मुजको नहीं वहशत ही सही…’, ‘आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक…’ सीमाब ‘ऐ बेख़बरी दिल को दीवाना बना देना…’, और ज़ौक़  ‘लायी हयात आए कज़ा ले चली चले…’ को अपनी आवाज़ के जादू से सहगल ने घर घर तक पहुंचाया । ग़ालिब उनके पसंदीदा शायर थे जिसकी मज़ार की मरम्मत भी उन्होंने करवायी थी । उनकी ग़ज़ल गायकी की एक ख़ासियत थी कि वे ग़ज़ल को एक अनूठी तीव्रता से गाते थे । वे प्राय: तीन मिनट की ग़ज़ल में मुखड़े के साथ 5 या 6 शेर गा देते थे, सब कुछ एक बेहतरीन मिटर और सिमेट्री के साथ । एक निधार्रित तबले की उठी हुयी गति, एक निधार्रित बजाने वाले के संग ही वे गाते थे ।
 स्ट्रीट सिंगर का ये गीत कानन देवी के साथ गाया हुआ – बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए… (कुंदन लाल सहगल  ने इस गीत को लाइव रिकॉर्ड किया था. गीत का फिल्मांकन ऐसे हुआ था कि सहगल कैमरे के सामने लाइव गाते हुए जा रहे थे और साजिन्दे पीछे चल रहे थे बजाते हुए, कैमरे की आंख बचा कर. कानन देवी वाला संस्करण कभी रिकॉर्ड पर नही आया)
झूलना झुलाओ – शायद उनका गाया हुआ ये पहला गीत था. 
दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर टाइमकीपर, फिर टाइपराइटर मशीन के सेल्समॅन रहने के अलावा चमड़े की फॅक्टरी में भी उन्होंने काम किया । जम्मू में जन्मे और कलकत्ता में रेडियो स्टेशन पर गाना गाते आर सी बोराल ने उनको न्यू थियेटर्स के लिये चुना । फिल्म ‘पूरन भगत’ —1932 में दो गानों ‘राधे रानी दे डारो ना…’ व ‘भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी…’ को गाने के लिये उन्हें 25 रुपये मिले पर उसके रेकॉर्डस् हज़ारों में बिके, तब ग्रामोफोन कंपनी को लगा कि सहगल के साथ यह अन्याय हुआ है तब रॉयल्टी के आधार पर उनसे गवाने की दरख़्वास्त रखी गयी । सहगल बहुत भोले थे, बोले अगर मेरा गाना नहीं चला तो आपके पच्चीस रुपये भी डूब जाएंगे– यहाँ सहगल ने कंपनी से मौखिक करार किया और यहीं से रॉयल्टी की प्रथा भी शुरु हुई । 1940–1941 में न्यू थियेटर्स में आग लगी जिसमें उनकी शुरु की असफल फिल्में मुहब्बत के आंसू ,ज़िन्दा लाश, सुबह का सितारा, जल गयीं ।
न्यू थियेटर्स की ‘चंडीदास’ लोकप्रियता की पहली सीढ़ी थी । बाद में भारी सफल फिल्म ‘देवदास’ से वे बतौर गायक–एक्टर इतने मशहूर हुए कि लोकचाहना के शिखर तक पहुंच गये ।’बालम आए बसो मोरे मन में…’ और ‘अब दिन बितत नाहीं, दुख के…’ जैसे श्री केदार शर्मा के लिखे गानों ने शरतचंद्र के एक नाकाम, निराश प्रेमी की छवि को अमर बना दिया । देवकी बोस के निर्देशन में इस पहली पूर्ण सामाजिक फिल्म से स्वर्गीय बिमल रॉय भी जुड़े थे । एक निरंतर चली आती असफल, दुखदायी प्यार की दास्तान को जिस तरह पेश किया गया था उससे आहत हुए बिमल रॉय ने बाद में 1955 में अपने निर्देशन में ‘देवदास’ बनाकर इसी वेदना को दोहराया ।’प्रसीडेंट’, ‘दुश्मन’, ‘ज़िंदगी’, ‘स्ट्रीट सींगर’, ‘सूरदास’, ‘मेरी बहन’ ऐसी फिल्में हैं जो उन्हों ने अपने फिल्म जीवन के मध्यान्ह के समय कीं, और ज़ाहिर है, इन फिल्मों के गानों की गूंज न सिर्फ उस समय परंतु आज भी और आने वाले सालों तक सुनी जाएगी । बंबई में, उनकी बाद की फिल्में रणजीत की ‘तानसेन’, और ‘भँवरा’, कारदार की ‘शाहजहाँ’ थी ।’तदबीर’ और ‘परवाना’ में उस समय की उभरती गायिका अदाकारा सुरैया के साथ नायक बने ।’शाहजहाँ’ व ‘परवाना’ उनकी अंतिम फिल्में थीं ।’ऐ दिले बेकरार झूम…’, ‘जन्नत ये बनायी है मोहब्बत के सहारे…’ शाहजहाँ और ‘मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पाई जाती है…’, ‘कहीं उलझ न जाना…’ —परवाना फिल्मों के यह गाने गा कर उन्हों ने साबित कर दिया कि उनकी न्यू थियेटर्स की शुरु की गायकी 1933–34 और आख़िरी 1947 की गायकी की उत्तमता में कोई फ़र्क नहीं आया था ।
जितनी सहजता से वे अपनी मातृभाषा पंजाबी में गाते थे उतनी ही मीठास से वे बंगला गाने गाते थे ।पंजाबी एक या दो जब कि बंगला के कई गाने उनके उपलब्ध हैं ।हिंदी में उन्हों ने कृष्ण भजन बहुतेरे गाये हैं भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी,राधे रानी दे डारो ना, सुनो सुनो हे कृष्ण काला, फिल्म ‘सूरदास’ व ‘चंडीदास’ आदि के भजन भी कृष्ण भजन में शामिल हैं, पर उनका कोई राम भजन जेहन में नहीं आ रहा है ।
यह सत्य भी सभी जानते हैं कि हमारे सभी नामी गायक जैसे मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार किस तरह अपने शुरूआती दौर में कुंदन लाल सहगल की नकल किया करते थे, इस बात का ज़िक्र उन्हों ने ख़ुद हमेशा किया है । लता जी ने कुंदन लाल सहगल  के ‘सो जा राजकुमारी…’ को कॅसेट में भी गाया है । मुकेश का ‘दिल जलता है तो जलने दे…’ पहली नज़र व किशोर कुमार का ‘मरने की दुआएं क्यूँ मांगू…’ ज़िददी दोनों गीत इस बात की मिसाल हैं कि कुंदन लाल सहगल  की तान उन पर किस कदर हावी थी । किशोर कुमार इस कदर सहगल के दीवाने थे कि वे अपने घर में निरंतर, लगातार ज़िंदगी के आख़िर दिनों तक उनके गाने सुना करते थे,यह बात उनकी पत्नी लीना चंदावरकार ने बतायी । सुना है कि महान कालाकार प्रेमनाथ भी हर समय, फिल्म शूटिंग के दौरान भी, कुंदन लाल सहगल  के गानों की कसॅट सुन करते थे ।पिछली पीढ़ी के अदाकार जो कि एक गहरी साहित्यिक और भाषाई हिंदी, उर्दू की समझ, ज्ञान रखते थे, सहगल की गायकी के कायल रहे हैं जिनमें कला के महान स्तंभ अशोक कुमार, प्राण, राज खोसला जैसे अनगिनत नाम हैं । सहगल के लहज़े की नकल उस दौर के व बाद के हर गायक ने कहीं न कहीं की । सहगल के गैर फिल्मी गीतों–ग़ज़लों की गायकी परंपरा को सी एच आत्मा, तलत मेहमूद, जगमोहन जैसे कलाकारों ने आगे बढ़ाया ।नौशाद ने कुंदन लाल सहगल की मृत्यु के बाद जालंधर में मनायी गयी उनकी बरसी पर लिखा था संगीत के माहिर तो बहुत आए हैं लेकिन दुनिया में कोई दूसरा ‘सहगल’ नहीं आया ।

Tuesday, 9 April 2019

शक्ति सामंत