
छात्र के तौर पर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित मृणाल सेन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा से जुड़े थे। हालांकि वह कभी पार्टी के सदस्य नहीं बनें। वह ‘इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन’ का हिस्सा थे। संयोग से एक दिन फिल्म के सौंदर्यशास्त्र पर आधारित एक पुस्तक उनके हाथ लग गई। जिसके कारण उनकी रुचि फिल्मों की ओर बढ़ी। इसके बावजूद उनका रुझान बुद्धिजीवी रहा और मेडिकल रिप्रेजन्टेटिव की नौकरी के कारण कलकत्ता से दूर होना पड़ा। यह बहुत ज्यादा समय तक नहीं चला। वे वापस आए और कलकत्ता फिल्म स्टूडियो में ध्वनि टेक्नीशीयन के पद पर कार्य करने लगे जो आगे चलकर फिल्म जगत में उनके प्रवेश का कारण बना।
वह 1998 से 2003 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। मृणाल सेन के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म ‘आमार भुवन’ 2002 में रिलीज हुई थी। उनके परिवार में बेटा है। उनकी पत्नी अभिनेत्री गीता का निधन 2017 में हुआ था।
दादासाहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक मृणाल सेन का 95 साल की आयु में 30 दिसम्बर 2018 को निधन हो गया था । मृणाल सेन ने कोलकाता के भवानीपुर स्थित अपने आवास पर ही आखिरी सांस ली थी । मृणाल सेन लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे। उन्हें 1981 में पद्मभूषण और 2005 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
दादासाहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक मृणाल सेन का 95 साल की आयु में 30 दिसम्बर 2018 को निधन हो गया था । मृणाल सेन ने कोलकाता के भवानीपुर स्थित अपने आवास पर ही आखिरी सांस ली थी । मृणाल सेन लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे। उन्हें 1981 में पद्मभूषण और 2005 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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